Friday, May 1, 2026

हमारे साथ श्री रघुनाथ, फिर किस बात की चिंता।

  बीते दिनों बेटे का टूर्नामेंट था। आयोजन नोएडा के एक प्रतिष्ठित स्कूल में था। 

हम दोनों बाप बेटा एक लंबी ड्राइव के बाद आयोजन स्थल पर पहुंचे। 

स्कूल की चकाचौंध देखते ही बनती थी। 

बेटा बड़े गौर से इर्द गिर्द देख रहा था। वह महसूस कर रहा था के वह एक अजनबी जगह पर अजनबी लोगों के बीच आ गया है। 

अंडर 13 ऐज ग्रुप में उसका पहला मैच उसी स्कूल के लड़के के साथ था। 

उसके चेहरे से झलक रहा था के उस नए माहौल में वह दबाव में है। 




नई जगह पर जा कर एडेप्ट होने में समय लगता है और 11 साल के बालक के लिये तो स्वयं को उन परिस्थितियों में एक दम से ढाल लेना मुश्किल था। 


मैच शुरू हुआ और दबाव खेल पर झलकने लगा। विपक्षी हावी हो रहा था और उसके फेवर में दबा कर हूटिंग हो रही थी। 

बेटा मैच हार गया। 


उस दिन लीग सिस्टम के हिसाब से कुल 4 मैच होने थे अभी 3 मैच शेष थे। 


झल्लाहट और गुस्सा ऊसके चेहरे से टपक रहा था। झल्लाहट आंसुओं में तब्दील हो रही थी। 

मैं पास खड़ा था और उसके शांत होने का इंतजार कर रहा था। 

उसने घूंट भर पानी पिया। 

मैंने उसे सहलाया। 

कुछ मिनट बाद मैंने उससे पूछा के हार का क्या कारण रहा। 


कुछ समय वह निशब्द खड़ा रहा। फिर बोला "नया कोर्ट है, कुछ समझ में नहीं आया"


मैं उसके बताने से पहले ही समझ चुका था के नई जगह और एक दम से एडेप्ट करने में उसे झिझक हो रही है।  


हम देसी आदमी हैं। परिस्थिति विकट होती है तो #राम याद आते हैं। 


बातों बातों में मुंह से निकल गया "लंका भी तो राम जी के लिये नई जगह थी ? राम जी तो प्रेशर में ना आये। उलटा रावण को ही उसके होम ग्राउंड पर पछाड़ दिया"

बेटे ने मेरी ओर देखा। 


"और हिमालय, जब बजरंग बलि हिमालय गए, संजीवनी लेने तो उनके लिये भी तो हिमालय नया कोर्ट था ? नया ग्राउंड था?"


"वो तो भगवान थे" लड़के ने सुबकते हुए कहा। 


"तो हम उनके भक्त हैं" अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया। 


अगले कुछ समय में हमने अगले 3 मैच के विषय पर चर्चा की। 


पीठ ठोकने या तारीफ के लिये नहीं कह रहा लेकिन अगले 3 मैच लड़के ने एकतरफा जीते। ना माथे पर शिकन ना दिल में डर। निर्भीक, निडर हो कर खेला। बिंदास होकर खेला। 

उस मैदान को उस कोर्ट को, अपना कोर्ट समझ कर खेला। उसकी जीत उसके खेल में नहीं थी, वह समझ रहा था के वह संजीवनी खोजने निकला है और खाली हाथ वापिस नहीं आ सकता। 

उसकी जीत इस विचार में थी जो उसके मन मस्तिष्क में कौंध रहा था। 


 

कौन कहता है #राम केवल #रामायण में हैं, जीवन के हर कदम पर हर परिस्थिति में राम हमारा हाथ पकड़ कर चल रहे हैं। 


हमारे साथ श्री रघुनाथ, फिर किस बात की चिंता। 

शरण में रख दिया जब माथ, फिर किस बात की चिंता।।


पोस्ट साभार 🙏

Sunday, September 14, 2025

सिंह और गाय

 


एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया।घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए। 

दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढ़ते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।गाय समर्पित हृदय का प्रतीक है।बाघ अहंकारी मन है।मालिक सद्गुरु का प्रतीक है।कीचड़ यह संसार है।और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

ॐ श्री गुरुवे नमः

Saturday, February 22, 2025

जन्मदिवस विशेष (22 फरवरी), फ्रैंक पी. रामसे: गणित और दर्शन के विलक्षण प्रतिभा

            


     फ्रैंक प्लमटन रामसे (Frank Plumpton Ramsey) एक महान ब्रिटिश गणितज्ञ, दार्शनिक और अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने कम उम्र में ही अपने क्षेत्रों में क्रांतिकारी योगदान दिया। वे तर्क, संभावना, अर्थशास्त्र और गणितीय तर्कशास्त्र में अपनी अद्वितीय सोच के लिए जाने जाते हैं। उनका कार्य आधुनिक गणित और दर्शन के लिए एक महत्वपूर्ण आधारशिला साबित हुआ।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

फ्रैंक पी. रामसे का जन्म 22 फरवरी 1903 को कैंब्रिज, इंग्लैंड में हुआ था। उनके पिता आर्थर स्टैनली रामसे गणित के प्रोफेसर थे, जिससे फ्रैंक की गणित में रुचि प्रारंभ से ही बनी रही। उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज, कैंब्रिज से शिक्षा प्राप्त की और बहुत ही कम उम्र में अपनी विलक्षण बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। वे अत्यधिक प्रतिभाशाली थे और उनकी शिक्षा के दौरान ही उनकी गिनती प्रमुख विद्वानों में की जाने लगी।

गणित और रामसे थ्योरम

गणित के क्षेत्र में रामसे ने ग्राफ थ्योरी में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसे आज ‘रामसे थ्योरम’ (Ramsey Theorem) के रूप में जाना जाता है। इस प्रमेय का उपयोग संयोजन गणित (Combinatorics) और सैद्धांतिक कंप्यूटर विज्ञान में किया जाता है। यह प्रमेय इस सिद्धांत को प्रस्तुत करता है कि किसी बड़े संरचनात्मक सेट में कुछ संगठित उपसंरचनाएं अवश्य मिलेंगी।

उनका यह कार्य भविष्य में गेम थ्योरी, गणितीय तर्कशास्त्र और कंप्यूटर विज्ञान के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत बना। रामसे थ्योरम ने कॉम्बिनेटरिक्स (संयोजन गणित) को एक नया आयाम दिया और आज भी यह क्षेत्र इसके सिद्धांतों का उपयोग करता है।

दार्शनिक योगदान

रामसे न केवल एक महान गणितज्ञ थे, बल्कि उन्होंने दर्शनशास्त्र में भी गहरी रुचि ली। उन्होंने लुडविग विट्गेंस्टाइन के कार्यों की समीक्षा की और उनके तर्कशास्त्र को विकसित करने में सहायता की। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘Truth and Probability’ में उन्होंने संभाव्यता के आधारभूत सिद्धांतों को प्रस्तुत किया। उनकी इस विचारधारा ने आधुनिक विचारकों को बहुत प्रभावित किया।

उन्होंने भाषा, ज्ञान और तर्क पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया और उनके विचार आज भी एपिस्टेमोलॉजी और भाषा दर्शन में अध्ययन किए जाते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि किसी भी कथन की सच्चाई उसकी व्यावहारिक उपयोगिता पर निर्भर करती है, जिसे ‘प्रैग्मेटिक सत्य’ के रूप में जाना जाता है।

अर्थशास्त्र में योगदान

रामसे ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भी गहरी छाप छोड़ी। उनकी ‘रामसे मॉडल ऑफ ऑप्टिमल सेविंग’ (Ramsey Model of Optimal Saving) आर्थिक सिद्धांतों में एक महत्वपूर्ण संकल्पना मानी जाती है। इस मॉडल का उपयोग आर्थिक वृद्धि और संसाधन वितरण से संबंधित शोधों में किया जाता है।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने कराधान (Taxation) और कल्याणकारी अर्थशास्त्र (Welfare Economics) पर भी कार्य किया। उनकी ‘रामसे प्राइसिंग’ (Ramsey Pricing) थ्योरी बताती है कि प्राकृतिक एकाधिकार वाली कंपनियों को किस प्रकार मूल्य निर्धारण करना चाहिए ताकि सामाजिक कल्याण बना रहे और आर्थिक संतुलन बना रहे।

असमय निधन और विरासत

फ्रैंक रामसे का जीवन बहुत ही छोटा रहा। 26 वर्ष की आयु में, 19 जनवरी 1930 को उनका निधन हो गया। हालांकि उनका जीवनकाल संक्षिप्त था, लेकिन उन्होंने अपने कार्यों से गणित, दर्शन और अर्थशास्त्र के क्षेत्रों में स्थायी छाप छोड़ी। उनका प्रभाव न केवल उनके समकालीन विद्वानों पर पड़ा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों ने भी उनके कार्यों से प्रेरणा ली।

उनके गणितीय प्रमेय, दार्शनिक विचार और आर्थिक सिद्धांत आज भी शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बने हुए हैं। उनके योगदान को देखते हुए, उन्हें बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली विचारकों में से एक माना जाता है।

निष्कर्ष

फ्रैंक पी. रामसे एक बहुआयामी प्रतिभा थे, जिन्होंने गणित, दर्शन और अर्थशास्त्र में अमूल्य योगदान दिया। उनका कार्य आज भी इन क्षेत्रों में शोधकर्ताओं को नई दिशाएँ दिखाने का कार्य कर रहा है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि गहरी सोच और समर्पण से कम समय में भी महान योगदान दिया जा सकता है। उनकी गणितीय थ्योरम, तर्कशास्त्र, और आर्थिक मॉडल आने वाले समय में भी विज्ञान और समाज के विकास में सहायक बने रहेंगे।

स्रोत:

  1. Sahotra Sarkar (2003), Ramsey, Frank Plumpton (1903–1930), Oxford Dictionary of National Biography

  2. Mellor, D. H. (1983), Frank Ramsey (1903–1930), Proceedings of the British Academy

  3. Keynes, J. M. (1933), Essays in Biography, Macmillan

  4. Misak, Cheryl (2020), Frank Ramsey: A Sheer Excess of Powers, Oxford University Press

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