Showing posts with label updesh. Show all posts
Showing posts with label updesh. Show all posts

Sunday, September 14, 2025

सिंह और गाय

 


एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया।घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए। 

दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढ़ते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।गाय समर्पित हृदय का प्रतीक है।बाघ अहंकारी मन है।मालिक सद्गुरु का प्रतीक है।कीचड़ यह संसार है।और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

ॐ श्री गुरुवे नमः

Saturday, November 25, 2023

राह मिल गई

#कहानी- राह मिल गई

सामान से लदे थैलों के साथ रितु हांफने लगी थी, लेकिन रिक्शा था कि मिलने का नाम ही नहीं ले रहा था. थक-हारकर रितु पास ही के एक रेस्तरां में घुस गई और एक ठंडी लस्सी ऑर्डर कर दी. काउंटर पर गरम-गरम समोसे निकलते देख उसके मुंह में पानी आ गया. उसने दो समोसे भी ऑर्डर कर दिए. अपनी थुलथुल काया और थैले संभालती वह एक कोनेवाली सीट की ओर बढ़ गई. एक टेबल के पास से गुज़रते हुए उसने महसूस किया कि उस पर बैठा स्मार्ट सा नवयुवक उसे बहुत ध्यान से देखे जा रहा था. लेकिन रितु को नहीं लगा कि वह उसे जानती है और ऐसी बेडौल होती काया पर कोई लाइन मारेगा इसकी उसे उम्मीद नहीं थी. इसलिए वह इत्मिनान से घर फोन कर आया से बेबी के बारे में पूछने लगी. यह जानकर कि बेबी अभी तक सोई हुई है उसने संतोष की सांस ली.
“क्या मैं यहां बैठ सकता हूं?” उसी नवयुवक को अपने इतने समीप पाकर रितु चौंक उठी.

“आपने शायद मुझे पहचाना नहीं?” युवक कुर्सी खींचकर बैठ चुका था.

“मैं अंकित हूं, आपके नरेन जीजाजी का छोटा भाई. आपकी सीमा दीदी की शादी में आपसे मुलाक़ात हुई थी…”
“हां, हां… याद आया. अंकित नाम है न तुम्हारा? और तुम बी. कॉम. ऑनर्स कर रहे थे. पर तुम… तुम तो बिल्कुल बदल गए हो. मैं क्या, कोई भी तुम्हें एक बार में नहीं पहचानेगा.”
“आप भी तो कितना बदल गई हैं! ख़ैर, इंडियन लेडीज़ में शादी के बाद यह बदलाव तो आता ही है.”
अंकित का मंतव्य समझ रितु झेंप गई थी. अपनी थुलथुल होती काया पर उसे इससे ज़्यादा शर्मिंदगी पहले कभी महसूस नहीं हुई थी. बरबस ही उसे ख़्याल आ गया कितनी कमनीय और सुडौल काया थी उसकी! सहेलियां उसे देखकर ईर्ष्या से आहें भरती थीं, पर मां-बाप के दिए संस्कारों ने उसे कभी अपने रूप और छरहरी काया पर घमंड नहीं होने दिया था. वह हमेशा से ही सामनेवाले के गुणों को देखकर दोस्त बनाना पसंद करती थी न कि रूप को देखकर. इसीलिए सीमा दीदी की शादी में आए नरेन जीजाजी और उसका यह भाई अंकित जब उसकी प्रिय सहेली कविता के सांवले रंग और छोटे कद का मज़ाक बनाने लगे, तो रितु से सहन नहीं हुआ था और वह उन्हें टोक बैठी थी, “कोई आप लोगों को मोटा और चष्मिश कहे, तो आपको कैसा लगेेगा?”

रितु के तेवर देखकर दोनों के चेहरों का रंग उड़ गया था. रितु को भी अफ़सोस हुआ था कि उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए था.
वेटर दोनों के ऑर्डर रख गया था. अंकित ने जूस मंगाया था. सामने रखे समोसे जिन्हें देखकर रितु के मुंह में कुछ देर पूर्व पानी आ गया था अब उसे मुंह चिढ़ाते प्रतीत हो रहे थे. उस दिन उसने दोनों भाइयों को संतुलित देहयष्टि पर कितना लंबा-चौड़ा भाषण दिया था.

“देखिए रूप-रंग सब भगवान देता है, इसलिए उसका मज़ाक बनाना उचित नहीं है. हमारे हाथ में है अपनी काया को स्वस्थ, सुडौल ओैर आकर्षक बनाना. अपने गुणों को इतना उभारना कि ये कमज़ोरियां उसमें छुप जाएं…”
“आपके समोसे ठंडे हो रहे हैं.” अंकित ने चेताया तो पुरानी बातें याद कर रितु के चेहरे पर फिर से शर्मिंदगी के बादल मंडराने लगे. अंकित ने शायद उसकी मनःस्थिति भांप ली थी.

“अरे, आप शर्मिंदा मत होइए. मैं तो बल्कि पुरानी उन सब बातों के लिए आपको धन्यवाद देना चाहता हूं, मेरा यह बदला हुआ रूप-रंग आपकी उसी समझाइश की बदौलत ही तो है. मैंने वर्कआउट और संयमित खानपान से यह संतुलित देहयष्टि हासिल की है. मुझे 'मिस्टर राजस्थान' का ख़िताब भी मिल चुका है.”
“अरे वाह, बहुत-बहुत बधाई! अब आगे की क्या योजना हेै?” रितु ने एक समोसा ख़त्म कर दूसरा अंकित के आगे बढ़ा दिया.

“नहीं! यह सब अभी बंद कर रखा है. मैं दरअसल यहां महानगरी में मॉडलिंग के क्षेत्र में अपना भाग्य आज़माने आया हूं.”
“अरे वाह, बहुत अच्छे! ईश्‍वर करे तुम्हें ख़ूब कामयाबी हासिल हो. नरेन जीजू कैसे हैं?”
“वे तो अब भी वैसे ही हैं. आपकी समझाइश उन्होंने उसी वक़्त एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दी थी… ख़ैर, आपकी हौसलाअफ़जाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. वैसे मेरे पापा-मम्मी तो नहीं चाहते थे कि मैं इन सब मॉडलिंग आदि के पचेड़ों में पड़ूं, हमारा
अपना खानदानी व्यवसाय है. वे चाहते हैं मैं उसे संभालूं, पर मैं सोचता हूं इधर भी भाग्य आज़मा लूं. पांव नहीं जमा पाया, तो वह सब तो करना ही है.”
“हूं… वह भी ठीक है.” रितु का मोबाइल बजने लगा था.

“ओह बेबी उठ गई है. मुझे निकलना होगा.” रितु उठकर सामान आदि समेटने लगी थी.

“काश! अब तो रिक्शा मिल जाए.”
“मेरे पास गाड़ी है, मैं छोड़ देता हूं.” अंकित ने आगे बढ़कर उसका सामान उठा लिया, तो रितु मना नहीं कर पाई और मुस्कुराती हुई उसके साथ चल पड़ी. घर पहुंचकर रितु ने अंकित को धन्यवाद दिया और कॉफी के लिए आग्रह किया.

“आज तो नहीं, पर एक दिन आऊंगा ज़रूर, अब तो घर भी देख लिया है. कॉफी उधार रहेगी.”
अंकित लौट गया था, पर रितु के दिल के सोए तार छेड़ गया था. अब दिन में फ्री होने पर वह अक्सर पुराने एलबम लेकर बैठ जाती. अपनी पुरानी तस्वीरें देखकर आहें भरती रहती. इससे भी मन नहीं भरता, तो संदूक खोलकर पुराने ड्रेसेज़ टटोलने लगती, जिनमें समाकर कभी उसकी कमनीय काया खिल उठती थी. उसे याद आया सहेलियां कहती थीं इस ड्रेस को पहनने से तेरी नहीं इस ड्रेस की शोभा बढ़ गई है. कपड़े सहेजकर रखते रितु के चेहरे पर यह सब याद कर मायूसी पसर जाती थी. जिससे फिर वह चाहकर भी उबर नहीं पाती थी. आख़िर एक दिन उसने निश्‍चय कर लिया कि वह अपनी पुरानी देहयष्टि पाकर ही रहेगी.

रितु की दिनचर्या में आया बदलाव ग़ौर करने लायक था. सवेरे बेबी के उठने से पहले वह 2 घंटे जॉगिंग कर आती. उसके बाद डायटीशियन द्वारा बताया गया उबला या भाप में पकाया हुआ खाना खाती. शाम को फिर हल्का वर्कआउट. चार दिन बीतते-बीतते रितु का जोश ठंडा पड़ने लगा था. पूरे दिन बदनदर्द और कमज़ोरी के एहसास ने उसके चेहरे को निस्तेज़ कर डाला था. पति गौरव से यह सब नहीं देखा गया.

“रितु, तुम जैसी हो ठीक हो. मुझे तुम ऐसे भी पसंद हो. यह डायटिंग, वर्कआउट तुम्हारे बस की बात नहीं है. वज़न तो कम होगा नहीं व्यर्थ ही और बीमारियों को न्यौता दे बैठोगी.”
लेकिन पति की समझाइश ने आग में घी का काम किया. रितु ने निश्‍चय कर लिया कि वह सबको ग़लत सिद्ध करके दिखाएगी. आख़िर इंसान को कुछ तो अपनी ख़ुशी के लिए भी करना चाहिए. वह दोगुने जोश से अपने अभियान में जुट गई थी. 4-6 महीने बीतते-बीतते परिवर्तन स्पष्ट नज़र आने लगा था. रितु दर्पण में ख़ुद को निहारती और ख़ुद पर ही मोहित हो उठती.

लोगों की आंखों में अपने प्रति प्रंशसा के भाव उसे लुभाते. मन ही मन वह अंकित को धन्यवाद देती, जिसने उसे ख़ुद से प्यार करना सिखाया. यदि अब अंकित उसे देखे, तो उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी? रितु सोचती और मन ही मन उसकी प्रतिक्रिया की कल्पना कर फूली नहीं समाती.

उसकी इच्छा उस दिन सचमुच जीवंत हो उठी जब एक दिन अंकित ने आकर उसके दरवाज़े की घंटी बजा दी. दरवाज़ा खोलते ही अंकित को देखकर उसके मुंह से ख़ुशी की चीख निकल गई थी. अंकित ठिठककर दो कदम पीछे हट गया था. ओैर आंखें फाड़-फाड़कर रितु को देख रहा था. उसकी विस्मय से चौड़ी होती आंखें देखकर रितु का हंस-हंसकर ताली पीटने को मन कर रहा था.
“आप क्या कोई जादू जानती हैं? कभी शरीर में हवा भर लेती हैं कभी निकाल देती हैं?”
रितु इस प्रतिक्रिया पर हसंते-हंसते लोटपोट हो गई थी. अंकित सामने सोफे पर बैठा उसे इस तरह हंसते देखकर मुस्कुराता रहा. “यदि हंसी थम गई हो, तो मेरे लिए कॉफी बना लाओ. मैं तो अपना कॉफी पीने का वादा पूरा करने आ गया हूं.”
बेबी सो रही थी, इसलिए गरम-गरम कॉफी के घूंट भरते दोनों देर तक बतियाते रहे.

“इधर से गुज़र रहा था. सोचा आपको निमंत्रण देता चलूं. दो दिन बाद मेरा शो है. मैं चाहता हूं आप मुझे रैंप पर वॉक करता हुआ देखें.”
“हां, हां.. क्यों नहीं! कुछ सिने मैगजीन्स में पढ़ा था तुम्हारे बारे में. कुछ एड वेड भी किए हैं?”
“हां, दो-चार छोटे-मोटे.”
रितु ग़ौर कर रही थी अंकित के चेहरे पर वह ख़ुशी नहीं थी, जो इच्छित वस्तु पा लेने पर इंसान के चेहरे पर आ जाती है.
“तुम्हारे मां-पिताजी? घर जाना हुआ या नहीं? वे ख़ुश हैं?”
“हां, सभी मेरी कामयाबी से बहुत ख़ुश हैं या शायद यह सोचकर ख़ुश हैं कि मैं खुश हूं. दो बार घर भी हो आया हूं. सभी के लिए तोह़फे लेकर गया था. मां कहती है मेरी वजह से उनकी आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में इज़्ज़त बढ़ गई है.”
“यह तो तुम्हारे लिए गर्व की बात है.”
“मेरा छोटा भाई और कुछ और भी चचेरे-ममेरे भाई-बहन इस क्षेत्र में आना चाहते हैं.”

उसके चेहरे पर चिंता की रेखाएं उभर आई थीं, जिन्हें रितु स्पष्टतः देख सकती थी.
“तुम क्या चाहते हो?”
मैं उनकी आंखों में वही उत्सुकता, वही सपने देखता हूं, जो कभी मेरी आंखों में थे. पर यह सब देखकर मुझे ख़ुशी नहीं होती, वरन एक अनजाना-सा भय घेरने लगता है.”
“भय? कैसा भय?” रितु हैरत में थी.

“इस मायानगरी की चकाचौंध आकर्षित तो करती है, पर पास आने पर पता चलता है सब मृगमरीचिका हेै. ग्लैमर की यह नगरी अंदर से खोखली और अस्थिर है. यदि मैं अपने भाई-बहनों को यह सब बताऊंगा तो शायद वे मेरी बातों पर यक़ीन नहीं करेगें.

समझेगें मैं उनकी मदद नहीं करना चाहता. मेरे माता-पिता ने शायद अपने अनुभव के आधार पर मुझे पहले ही चेता दिया था. तब मैंने उनकी सलाह अनसुनी कर दी थी. पर हक़ीक़त यह है कि आज मैं उनके पास लौटना चाहता हूं. अपने पुश्तैनी व्यवसाय से जुड़ना चाहता हूं. वहां मेहनत है, तो साथ में सम्मान, प्यार और निश्‍चित आय भी है. यहां सिर्फ़ मेहनत है और किसी चीज़ की गारंटी नहीं है. मैं असमंजस में हू कि क्या मुंह लेकर लौटूं और किस मुंह से अपने भाई-बहनों को यहां न आने की सीख दूं?”

“तुम कुछ ज़्यादा ही उद्विग्न हो रहे हो. जबकि समस्या इतनी गंभीर नहीं है. मेरा कहा मानो तो जो कुछ तुमने सीखा, देखा और भोगा है वही सब कुछ अपने परिचितों को बता दो. अब यह उनकी इच्छा है कि वे क्या कदम उठाते हैं? कई बार हम अनजाने ही किसी के आदर्श बन जाते हैं. जैसे कि मैं तुम्हारी आदर्श बन गई थी. तुम अपने भाई-बहनों के आदर्श बन गए हो.

तुम मेरे रास्ते पर चलते हुए कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते चले गए. मिस्टर राजस्थान बने, फिर मॉडल बने… और मैं… मैं अपने ही दिखाए रास्ते से भटक गई. फिर तुम्हें देखा, तो अपना आदर्श याद आया. फिर सही राह पर चलने लगी. लेकिन तुम्हारे भाई यानी जीजू ने सब देखकर भी अनदेखा कर दिया. वे आज भी वहीं हैं. आगे नहीं बढ़ पाए. कहने का सार यह है कि आप किसी के आगे बढ़ने, न बढ़ने का हेतु यानी कि एक सहायक कारण हो सकते हैं, पर एकमात्र ज़िम्मेदार कारक नहीं. अपनी हर प्रगति अवनति के लिए इंसान स्वयं ज़िम्मेदार होता है, कोई दूसरा नहीं.”
“मुझे डर है जिस तरह मैंने अपने माता-पिता की नहीं सुनी, उसी तरह वे भी मेरी बात नहीं सुनेगें.”
“कोई बात नहीं. देखो अंकित, दुनिया में भिन्न-भिन्न तरह के लोग होते हैं. कुछ दूसरों को लड़खड़ाते देखकर ख़ुद संभलकर चलने लग जाते हैं, तो कुछ रास्ता ही बदल लेते हैं. कुछ ख़ुद के लड़खड़ाकर गिरने का इंतज़ार करते हैं. फिर संभलते हैं. तो कुछ ऐसे भी होते हैं, जो सब कुछ देखते-सुनते हुए भी अंधे-बहरे बने रहते हैं. उनका कुछ नहीं हो सकता. इसलिए बिना कोई अपराधबोध पाले तुम अपना पक्ष दुनिया के सामने रख दो. अब कौन, क्या निर्णय लेता है इसके लिए वे स्वयं ज़िम्मेदार होगें, तुम नहीं.

जहां तक माता-पिता के पास किस मुंह से लौटने की बात है, तो इंसान को ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए. दुनिया में एक माता-पिता ही तो ऐसे हैं जिनके पास लौटने में इंसान को कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनका प्यार निःस्वार्थ होता है. यदि हम सच्चे दिल से क्षमा मांगते हुए उनके पैरों में झुकेगें, तो उनके घुटनों तक ही झुक पाएंगे, क्योंकि पहले ही उनके भावातिरेक से कांपते हाथ हमारे कंधे थाम लेगें.” अपनी बात समाप्त कर रितु ने नज़रें उठाईं, तो पाया अंकित का चेहरा आंसुओं से तर था. पर चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे. शायद उसे अपनी राह मिल गई थी.- संगीता

लाखों मैं

#कहानी- लाखों में… 
‘’नैना, तेरा चुनाव ही ग़लत था. अबकी बार नील को बोल आना कि अब उसकी ज़िंदगी में वापस नहीं आऊंगी...”
“वापस नहीं आऊंगी का क्या मतलब है मम्मी? घर है मेरा, जब मर्ज़ी है आऊंगी-जाऊंगी और आप तो पार्क में ही इंतज़ार करना, घर मत आना.”

“सुन, फोन करूंगी, अपने पास ही रखना.” रागिनी की आवाज़ पर बिना प्रतिक्रिया दिए वह तेज़ी से अपने अपार्टमेंट की ओर बढ़ गई. बैठक का दरवाज़ा अभी भी अधखुला था. जिस तरह से वह छोड़ गई थी, बिल्कुल वैसे यानी कि नील ने सर उठाकर देखने की ज़हमत भी नहीं उठाई कि उसकी बीवी उसे छोड़कर मायके चली गई थी. नील आंखें मूंदे गिटार के तारों को छेड़ रहा था और वह सामने खड़ी उसे घूर रही थी. 

हैरानी हुई कि कोई इस दर्जे तक असंवेदनशील कैसे हो सकता है. वह दो किलोमीटर दूर स्थित अपने मायके भी हो आई और वह अभी भी उसी मुद्रा में बैठा गिटार के तारों को टुनटुना रहा था. गिटार की धुन में ये भी नहीं जान सका कि वह चार घंटे से घर पर नहीं है. डायनिंग टेबल के पास ‘मैं मम्मी के घर जा रही हूं’ की पर्ची उसे मुंह चिढ़ा रही थी यानी कि इस पर्ची को अभी तक नील ने देखा भी नहीं. नैना ने पर्ची निकालकर उसके टुकड़े कर दिए, फिर ग्लास से पानी भरकर पीया और ग्लास ज़ोर से टेबल पर पटक दिया. आवाज़ सुनकर गिटार पर फिरती उंगलियां रुक गईं. 

आंखें खोलकर उसने नैना को देखा और बड़े इत्मीनान से बोला, “चाय लाओ, थक गया हूं... बदन अकड़-सा गया है.” उसने अंगड़ाई ली. अपना मोबाइल डायनिंग टेबल पर छोड़कर नैना दनदनाती हुई बेडरूम में चली आई. बाहर से आकर अपना मोबाइल डायनिंग टेबल पर छोड़ना उसकी आदत में शुमार था. नैना ने झटके से अपना वॉर्डरोब खोला. एक सरसरी नज़र डालकर पट बंद करके वहीं बैठ गई. दिल धड़का. वह तो नील को छोड़कर मम्मी के घर जाने के लिए कपड़े लेने आई है. 

इन सबसे बेख़बर वह गिटार की धुन में खोया हुआ है. सोच के तो आई थी कि अपना सामान पैक करके उसके मुंह पर सीधा बोलूंगी, ‘लो, जा रही हूं मायके, अब तुम गिटार के साथ फुर्सत में दिल बहलाओ,’ पर यहां आकर महसूस हुआ कि परले दर्जे के लापरवाह के ऊपर पूरा घर कैसे छोड़ जाए. वह तो गिटार में डूब जाएगा और चोर घर साफ़ कर जाएंगे. “नैना, मम्मीजी का फोन आ रहा है.” नील की आवाज़ से वह चौंकी, वह उसका मोबाइल लिए खड़ा था.

नैना ने जैसे ही फोन पर ‘हेलो’ कहा, रागिनी की उत्तेजना भरी आवाज़ आई, “सुन, इस बार उसकी भोली शक्ल पर तरस मत खाना. ग़लती सुधारने का मौक़ा मिला है, तो उसे गंवाना ठीक नहीं.”

“मम्मी, मैं आपको बाद में फोन करती हूं.” अचरज हुआ कि उसकी मम्मी उसका घर तुड़वाने में इतनी हड़बड़ी क्यों कर रही हैं. और ये ग़लती सुधारने की क्या बात कर रही हैं, कहीं उसकी शादी तुड़वाकर अपनी सहेली के देवर के बेटे से करने की तो नहीं सोच रही हैं? हे ईश्‍वर! उसकी मम्मी नील की फिल्मी खड़ूस सास निकली. उसने अपना सर पकड़ लिया. नील उसे यूं परेशान देखकर उसके क़रीब बैठ गया. फिर उसका हाथ सहलाते हुए कहने लगा, “क्या हुआ, मम्मी का फोन क्यों आया था? वहां सब ठीक तो है न?” “हां, सब ठीक है. 

तुम जाओ और गिटार बजाओ.” यह सुनकर वह उसके क़रीब बैठ गया और उसके हाथों को सहलाते हुए बोला, “मैं जानता हूं कि इन दिनों मैं तुम्हें ज़रा भी समय नहीं दे पाया, पर यकीन मानो, इस बार कुछ ऐसा बजाना चाहता हूं, जो लोगों के मन को छू जाए. कल का दिन बहुत ख़ास है. कल मेरे गिटार ने मिस्टर थॉमस को इम्प्रेस कर दिया, तो वो यूरोप जानेवाले वेव्ज़ ग्रुप के लिए मुझे सिलेक्ट कर सकते हैं. यूरोप ट्रिप मेरी तरफ़ से तुम्हारे लिए जन्मदिन का तोहफ़ा होगा.” उसकी बात पर नैना ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो वह बोला, “तुम बहुत थकी लग रही हो. चाय बनाकर लाता हूं.”

“नहीं, मैं बनाती हूं.” कहते हुए वह उठ गई. नील की बातों और भावनाओं से वाकिफ़ होकर सहसा उसे ग्लानि हुई. चाय के खदबदाते पानी के साथ एक चलचित्र-सा घूम गया. आज रविवार का दिन- सुबह छह बजे से लेकर दोपहर तीन बजे तक नील गिटार में खोया रहा. ऊबी हुई-सी पहलू बदलते उसने नील को आवाज़ लगाई, पर नील के कानों तक उसकी आवाज़ मानो पहुंची ही नहीं. पिछले दो हफ़्तों से नील गिटार पर किसी ख़ास धुन को निकालने की कोशिश कर रहा है, पर आज तो हद ही हो गई. नैना की अप्रत्याशित प्रतिक्रिया के पीछे पिछले कई दिनों से नील का अपने गिटार के प्रति अति समर्पण भाव और उसके प्रति उदासीनता थी. वह चिल्लाई, “नीलाक्ष, सुन भी रहे हो, मैं दीवारों से बात नहीं कर रही हूं.” नैना की तेज़ आवाज़ पर वह निस्पृह भाव से उस पर सरसरी दृष्टि डालकर गिटार के तारों में उलझ गया. चिढ़कर नैना ने उसके हाथों से गिटार लगभग छीना, तो नील बौखलाकर अपने गिटार को उसकी गिरफ़्त से बचाता हुआ झल्लाया, “नैना प्लीज़, बिहेव. ये कोई तरीक़ा है. अभी इसे कुछ हो जाता तो.”   
उसने गिटार को अपने सीने से यूं लगाया मानो उसमें उसकी जान बसती हो. यह देखकर नैना क्रोध से जल उठी. आंखों में आंसू डबडबा आए. नील की जिस कला पर मोहित होकर उसने कई रिश्ते ठुकराकर उसका हाथ थामा था, आज वही कला उन दोनों के बीच दीवार बन गई थी. नैना के आंसुओं को देखने की नील को फुर्सत कहां थी. वह तो अपने गिटार के तारों को छेड़कर देख रहा था कि कहीं वो ढीले तो नहीं हो गए. गिटार के प्रति नैना का शत्रुभाव देखकर वह हैरानी और तनावग्रस्त भाव लिए बैठक में चला आया और कानों में ईयरप्लग लगाकर आंखें मूंदे गिटार की धुन में फिर खो गया. ‘मैं मम्मी के घर जा रही हूं.’ वह अपने कमरे से चिल्लाई पर कोई जवाब नहीं मिला. नील के लिए उसका होना, न होना एक बराबर था, यह जान उसका सर्वांग जल उठा. एक पर्ची पर ‘मैं मम्मी के घर जा रही हूं’ लिखकर डायनिंग एरिया में छोड़कर वह उसके सामने से घर से निकली. बंद आंखों और कानों में लगे ईयरप्लग के कारण वह जान ही नहीं पाया कि नैना घर से बाहर निकल गई है. मायके में उसके सहसा यूं तनावग्रस्त दाख़िल होते देखकर हरीश-रागिनी समझ गए कि नील से कोई अनबन हुई है. ऐसा पहली बार नहीं था, पहले भी तीन-चार बार वह रूठकर मायके आ चुकी है. अमूमन मनमुटाव की वजह गिटार ही होता. ऐसे में रागिनी-हरीश नैना को समझाते-बुझाते कि नील के गिटार पर फ़िदा होकर उसने शादी का निर्णय लिया. वह एक कलाकार है. ऐसे में उसकी कला और रियाज़ का मान-ध्यान रखना उसका कर्त्तव्य है. नैना का कहना था कि कलाकार के अलावा अब वो उसका पति भी है. उसके गिटार ने सौतन बनकर सारे सुख-चैन हर लिए हैं.
आज नाराज़ नैना से जब हरीश ने पूछा, “तुम घर छोड़कर आई हो, ये बात नील को पता है क्या?” यह सुनकर कंधे उचकाती हुई वह बोली, “क्या जानूं... उस व़क्त तो कान में ईयरप्लग लगाए, आंखें मूंदे पता नहीं कौन-सा सुर साध रहा था.”
“फोन किया उसने...?”
“पता नहीं, मैंने स्विच ऑफ कर दिया.” उसके मुंह से यह सुनकर हरीश नाराज़गी भरे स्वर में बोले, “बचपना छोड़ो, सबसे पहले मोबाइल ऑन करो. गिटार उसकी ज़िंदगी है, उसकी रोज़ी-रोटी है. तुम क्या चाहती हो, शादी के बाद वो उसे छोड़ दे.” यह सुनकर नैना चिढ़कर बोली, “पापा, आप समझ नहीं रहे हैं. गिटार के प्रति उसकी दीवानगी इस कदर है कि मैं सामने बैठी हूं, नहीं हूं, उसे कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता है.”
“सही कह रही है नैना, मैंने भी देखा है. वह घंटों बैठा तार टुनटुनाता रहता है.” अचानक रागिनी नैना के पाले में खड़ी हो गई, तो हरीश और नैना दोनों ही चौंके.
“क्या करूं? बोलो तो कुछ दिनों के लिए उसे अकेला छोड़कर अपने कपड़े लेकर यहां आ जाऊं.” नैना के मुंह से निकला, तो रागिनी कठोर वाणी में बोली, “कुछ दिन के लिए क्यों? अब तू यहीं रहेगी. पहले ही कहा था इस नील के चक्कर में मत पड़. अरे! शादी ही करनी थी, तो मेरी सहेली के देवर के बेटे से कर लेती. कम से कम यूरोप तो घुमाता.” अपनी शादी के एक साल बाद आज अचानक सहेली के देवर के बेटे की याद मम्मी को आना विस्मयजनक था यानी आज भी मम्मी को नैना का सहेली के देवर के बेटे से शादी न करने की बात सालती है. इस बात से चिढ़ी नैना बोली, “मम्मी प्लीज़, ओवर रिएक्ट मत करो.”
“अरे! अभी भी ओवर रिएक्ट न करूं? तुम परेशान हो नीलाक्ष से.”
“मम्मी प्लीज़, मैं नीलाक्ष से नहीं, उसके गिटार से परेशान हूं.” “हां-हां, एक ही बात है. मुआ गिटार हो या नीलाक्ष, परेशान तो है न तू.”
“मम्मी, गिटार मुआ नहीं है, वो नीलाक्ष का काम है, उसकी कला है.” भुनभुनाती हुई नैना को हैरानी से देखते हुए रागिनी बोली, “बड़ी अजीब है रे तू, न इस करवट चैन है, न उस करवट. ख़ुद शिकायत करती है और ख़ुद ही तरफ़दारी. हम क्या बेवकूफ़ लगते हैं तुझे. एक डिसीज़न लो. ये क्या कि ज़रा-सी बात हुई और दौड़ी आई मायके.”

“आप इस तरह की फ़ालतू बात करोगी, तो मैं यहां नहीं आऊंगी. मायका है, अपना हक़ समझती हूं, इसलिए चली आती हूं. मुझे लगता था आप लोग मुझे समझोगे.”
“अरे! तो समझ ही रही हूं, तभी तो उस कमबख़्त को गालियां दे रही हूं.”
“थोड़ा तो लिहाज़ करो, दामाद हैं नीलाक्ष तुम्हारे. मैं घर जाकर अपने कपड़े ले तो आऊं, पर उससे पहले घर का कुछ इंतज़ाम भी करना होगा. वो तो इतना लापरवाह है कि उसे ख़ुद का होश नहीं रहता, घर क्या खाक संभालेगा.”

“सब संभालेगा, क्यों नहीं संभालेगा? अब उसकी चिंता छोड़कर आगे की सोच. हम भी चलते हैं साथ.” रागिनी के कहने पर नैना एकदम बिदककर बोली, “नहीं, आप बिल्कुल नहीं चलेंगी और नील से तो कुछ भी नहीं कहेंगी.”
“ठीक है, नहीं कहूंगी, पर साथ चलूंगी. मैं नीचे पार्क में इंतज़ार करूंगी. तुम अपने कपड़े ले आना.” रागिनी की ज़िदभरी योजना और व्यवहार से हरीश नाख़ुश थे. बेटी को समझा-बुझाकर घर भेजने की जगह आग में घी डालने की चेष्टा उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आई. लेकिन रागिनी पर तो आज जैसे कोई भूत सवार था. नील से उसे अलग करने का भूत..

मोबाइल की घंटी से फिर विचार बाधित हुए, रागिनी का नंबर देखकर उसने संभलते हुए कहा, “हेलो मम्मी, मैं घर से बाहर थी, यह बात नील को पता ही नहीं चली. वो बेचारा सुबह से रियाज़ कर रहा है. कल एक कॉन्सर्ट है, इसलिए आज मैं उसे कोई झटका नहीं देना चाहती हूं, उसकी परफॉर्मेंस बिगड़ जाएगी.” इस पर रागिनी तेज़ स्वर में बोली, “बिगड़ती है तो बिगड़ने दे और हां, उसका दिमाग़ कहां रहता है. बीवी तीन घंटे से घर में नहीं थी और उसे पता नहीं चला, किस दुनिया में रहता है नील?”

“ओफ़्फ़ो मम्मी! आप क्या जानो आर्टिस्ट क्या होता है? सुर साधना किसे कहते हैं? पिछले एक हफ़्ते से उसने ढंग से कुछ खाया-पीया भी नहीं है. सब मेरी ग़लती है. मुझे ही घर छोड़ने की जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए.” उसने भुनभुनाते हुए फोन काट दिया. रागिनी को अकेले ही घर आया देख हरीश अपनी प्रसन्नता छिपा नहीं पाए, “अरे! नैना नहीं आई, वहां सब ठीक तो है न?” यह सुनकर रागिनी शांत भाव से बोली, “उम्मीद तो है सब ठीक हो जाएगा और तुम्हारी अधैर्य बेटी को कुछ सद्बुद्धि आएगी. वैसे भी उसे कब यहां आना था. वो तो बस ये चाहती है कि वो नील को बुरा-भला कहे और हम नील को भला कहकर उसके चुनाव पर सही की मोहर लगाकर उसे आत्मतुष्टि पहुंचाएं.” 

बेस्ट सेलर गीजर फ्रॉम टॉप ब्रांड्स - अभी चेक करें.. https://amzn.to/3MKh7Eo

हरीश रागिनी के खुलासे पर हैरान थे, “जानते हो हरीश, नैना के जाने के बाद नील ने उसकी लिखी पर्ची पढ़ ली थी. नैना का फोन स्विच ऑफ आने पर उसने मुझे फोन करके सारी बात बताई. वह बेचारा सॉरी बोलते हुए उसे मनाने आ रहा था, पर मैंने ही मना कर दिया. अभी जब नैना घर गई, तो मैंने नील को कॉल करके सतर्क कर दिया. हमारी योजना के आधार पर ही उसने ऐसे दर्शाया कि नैना के जाने का उसे पता ही नहीं चला. हर बार वह तिल का ताड़ बनाती है, मैंने सोचा इस बार मैं ही तिल का ताड़ बना दूं.”

“अब समझा, तुम यहां पर ओवर रिएक्ट करके नैना के मन में नील की उपस्थिति को टटोल रही थी.”

“क्या करती, समझाकर तो देख लिया. नैना हमेशा से ही ऐसी रही है कन्फ्यूज़-सी. याद करो, बचपन में जब वह अपनी पसंद का कोई खिलौना लेकर घर आती थी, तब उसमें बुराई निकालती थी. हम उसका आत्मविश्‍वास बढ़ाने के लिए उसके चुने खिलौने की जितनी ख़ूबियां गिनाते थे, वो उतनी बुराई खोजती थी. उसकी इस आदत से परेशान होकर जब मैं भी उसकी हां में हां मिलाकर खिलौने की बुराई करती, तब वह अपने खिलौने में ख़ूबियां ढूंढ़कर उसकी प्रशंसा करती. उसकी यह आदत अभी भी नहीं बदली. 

मानती हूं कि नील मुझे शुरू में नहीं पसंद था, पर उसका सादापन, उसकी कला और नैना के प्रति उसके समर्पण को मैंने भांपकर ही हामी भरी. ऐसे में नैना जब-तब उसकी आलोचना करती, तो मुझे उसके व्यवहार में उसका वही बचपना दिखता.” हरीश ने पत्नी के इस पक्ष को समझकर प्रशंसाभरी नज़रों से देखा, तो वह भावुक होकर बोली, “हर मां चाहती है कि उसकी बेटी मायके हंसी-ख़ुशी आए... नील सीधा-सादा लड़का है. उसे गिटार का पैशन है, यह कितनी अच्छी बात है... वरना तो लोगों को लड़कियां, शराब और न जाने कैसे-कैसे व्यसन होते हैं. अपना नील तो गिटार में व्यस्त रहता है. कलाकार है, उसमें भी इस बेवकूफ़ लड़की को आपत्ति है.” बातों-बातों में हरीश-रागिनी घर आए.

दो दिन तक न उन्होंने नैना को फोन किया और न ही नैना ने उन्हें. तीन दिन बाद नैना का रागिनी के मोबाइल पर फोन आया. “मम्मी आज का अख़बार देखा आपने? आप जिसे कोस रही थीं, वो यूरोप जा रहा है. उसकी परफॉर्मेंस को देखते हुए उसे ‘वेव्स ग्रुप’ में गिटार बजाने का मौक़ा मिला है. इस दिन का नील को कब से इंतज़ार था, और हां... नील कह रहे थे यूरोप ट्रिप उनकी तरफ़ से मेरे जन्मदिन का उपहार है. सोचो, मैं अपना जन्मदिन यूरोप में सेलिब्रेट करूंगी. क्या हुआ, अब आप चुप क्यों हैं? आपकी सहेली के देवर का बेटा ही अपनी बीवी को यूरोप नहीं घुमा सकता, नील जैसा एक आम इंसान भी अपनी बीवी को यूरोप घुमाने के लिए दिन-रात एक कर सकता है.” नील ‘आम’ कहां है, वो तो कलाकार है. रागिनी कहना चाहती थी, पर चुप रही फिर ठंडी सांस लेकर बोली, “मेरी सहेली के देवर के बेचारे बेटे की शादी तो खटाई में पड़ गई है, उसके शराब पीने की लत को देखकर एक लड़की ने उसे रिजेक्ट कर दिया.”

“हे भगवान! और आप उससे मेरी शादी करवा रही थीं. थैंक गॉड कि नील को गिटार का नशा है. कम से कम उसका नशा हमें प्राउड मोमेंट तो देगा. कम से कम अब तो मान लो कि नील से अच्छा जीवनसाथी कोई हो ही नहीं सकता.”

"हां भई, मान लिया तेरा नील हज़ारों में एक है.” कहे बिना रागिनी रह नहीं पाई, तो नैना बोली, “देखा, इसमें भी कंजूसी, ‘लाखों में एक’ नहीं कह सकती थीं.” रागिनी फोन रखकर एक बार फिर अपने प्यारे दामाद का मैसेज पढ़कर मुस्कुराने लगी, जिसमें उसने अपने दांपत्य के ‘तारनहार’ अर्थात् मां समान सास के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कोटिश: धन्यवाद लिखा था. - मीनू त्रिपाठी

कलेक्टर बेटी

एक फटी धोती और फटी कमीज पहने एक व्यक्ति अपनी 15-16 साल की बेटी के साथ एक बड़े होटल में पहुंचा। उन दोंनो को कुर्सी पर बैठा देख एक वेटर ने उनके सामने दो गिलास साफ ठंडे पानी के रख दिए और पूछा- आपके लिए क्या लाना है? 

उस व्यक्ति ने कहा- "मैंने मेरी बेटी को वादा किया था कि यदि तुम कक्षा दस में जिले में प्रथम आओगी तो मैं तुम्हे शहर के सबसे बड़े होटल में एक डोसा खिलाऊंगा।
इसने वादा पूरा कर दिया। कृपया इसके लिए एक डोसा ले आओ।"वेटर ने पूछा- "आपके लिए क्या लाना है?" उसने कहा-"मेरे पास एक ही डोसे का पैसा है।"पूरी बात सुनकर वेटर मालिक के पास गया और पूरी कहानी बता कर कहा-"मैं इन दोनो को भर पेट नास्ता कराना चाहता हूँ।अभी मेरे पास पैसे नहीं है,इसलिए इनके बिल की रकम आप मेरी सैलेरी से काट लेना।"मालिक ने कहा- "आज हम होटल की तरफ से इस होनहार बेटी की सफलता की पार्टी देंगे।" 

होटलवालों ने एक टेबल को अच्छी तरह से सजाया और बहुत ही शानदार ढंग से सभी उपस्थित ग्राहको के साथ उस गरीब बच्ची की सफलता का जश्न मनाया।मालिक ने उन्हे एक बड़े थैले में तीन डोसे और पूरे मोहल्ले में बांटने के लिए मिठाई उपहार स्वरूप पैक करके दे दी। इतना सम्मान पाकर आंखों में खुशी के आंसू लिए वे अपने घर चले गए।      

समय बीतता गया और एक दिन वही लड़की I.A.S.की परीक्षा पास कर उसी शहर में कलेक्टर बनकर आई।उसने सबसे पहले उसी होटल मे एक सिपाही भेज कर कहलाया कि कलेक्टर साहिबा नास्ता करने आयेंगी। होटल मालिक ने तुरन्त एक टेबल को अच्छी तरह से सजा दिया।यह खबर सुनते ही पूरा होटल ग्राहकों से भर गया।

कलेक्टर रूपी वही लड़की होटल में मुस्कराती हुई अपने माता-पिता के साथ पहुंची।सभी उसके सम्मान में खड़े हो गए।होटल के मालिक ने उन्हे गुलदस्ता भेंट किया और आर्डर के लिए निवेदन किया।उस लड़की ने खड़े होकर होटल मालिक और उस बेटर के आगे नतमस्तक होकर कहा- "शायद आप दोनों ने मुझे पहचाना नहीं।मैं वही लड़की हूँ जिसके पिता के पास दूसरा डोसा लेने के पैसे नहीं थे और आप दोनों ने मानवता की सच्ची मिसाल पेश करते हुए,मेरे पास होने की खुशी में एक शानदार पार्टी दी थी और मेरे पूरे मोहल्ले के लिए भी मिठाई पैक करके दी थी।
       🎈आज मैं आप दोनों की बदौलत ही कलेक्टर बनी हूँ।आप दोनो का एहसान में सदैव याद रखूंगी।आज यह पार्टी मेरी तरफ से है और उपस्थित सभी ग्राहकों एवं पूरे होटल स्टाफ का बिल मैं दूंगी।कल आप दोनों को "" श्रेष्ठ नागरिक "" का सम्मान एक नागरिक मंच पर किया जायेगा।  

 शिक्षा-- किसी भी गरीब की गरीबी का मजाक बनाने के वजाय उसकी प्रतिभा का उचित सम्मान करें।
बेटी बचाओ।
बेटी पढाओ

Thursday, October 4, 2018

●फूटा घड़ा ●



एक छोटी सी कहानी ...
■◆●फूटा घड़ा ●◆■
बहुत समय पहले की बात है , किसी गांव में एक किसान रहता था . वह रोज़ भोर में उठकर दूर झरनों से स्वच्छ पानी लेने जाया करता था . इस काम के लिए वह अपने साथ दो बड़े घड़े ले जाता था , जिन्हें वो डंडे में बांध कर अपने कंधे पर दोनों ओर लटका लेता था .
उनमे से एक घड़ा कहीं से फूटा हुआ था ,और दूसरा एक दम सही था . इस वजह से रोज़ घर पहुंचते-पहुंचते किसान के पास डेढ़ घड़ा पानी हीं बच पाता था .ऐसा दो सालों से चल रहा था .
सही घड़े को इस बात का घमंड था कि वो पूरा का पूरा पानी घर पहुंचाता है और उसके अन्दर कोई कमी नहीं है , वहीं दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि वो आधा पानी हीं घर तक पंहुचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार चली जाती है . फूटा घड़ा ये सब सोच कर बहुत परेशान रहने लगा और एक दिन उससे रहा नहीं गया , उसने किसान से कहा , “ मैं खुद पर शर्मिंदा हूं और आपसे क्षमा मांगना चाहता हूं ?”
“क्यों ? “ , किसान ने पूछा , “ तुम किस बात से शर्मिंदा हो ?”
“शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूं , और पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी घर पहुंचाना चाहिए था बस उसका आधा ही पहुंचा पाया हूं , मेरे अन्दर ये बहुत बड़ी कमी है , और इस वजह से आपकी मेहनत बर्वाद होती रही है .”, फूटे घड़े ने दुखी होते हुए कहा.
किसान को घड़े की बात सुनकर थोडा दुःख हुआ और वह बोला , “ कोई बात नहीं , मैं चाहता हूं कि आज लौटते वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को देखो.
घड़े ने वैसा ही किया , वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया , ऐसा करने से उसकी उदासी कुछ दूर हुई पर घर पहुंचते – पहुंचते फिर उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था, वो मायूस हो गया और किसान से क्षमा मांगने लगा .
किसान बोला ,” शायद तुमने ध्यान नहीं दिया पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे वो बस तुम्हारी तरफ हीं थे , सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था . ऐसा इसलिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था , और मैंने उसका लाभ उठाया . मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर रंग -बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे , तुम रोज़ थोड़ा-थोड़ा कर के उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना दिया . आज तुम्हारी वजह से हीं मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता हूं और अपना घर सुन्दर बना पाता हूं . तुम्ही सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता ?”
दोस्तों हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है , पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं . उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को वो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए और उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिए, और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी “अच्छे घड़े” से मूल्यवान हो जायेगा.।RadheyRadhey 🙏          

source- facebook

Monday, October 1, 2018

चिंताएं बाहर ही टाँग आएँ

*एक कहानी*

💞💞_चिंताएं बाहर ही टाँग आएँ_💞💞

सरला नाम की एक महिला थी । रोज वह और उसके पति सुबह ही काम पर निकल जाते थे ।

दिन भर पति ऑफिस में अपना टारगेट पूरा करने की ‘डेडलाइन’ से जूझते हुए साथियों की होड़ का सामना करता था। बॉस से कभी प्रशंसा तो मिली नहीं और तीखी-कटीली आलोचना चुपचाप सहता रहता था ।

पत्नी सरला भी एक प्रावेट कम्पनी में जॉब करती थी । वह अपने ऑफिस में दिनभर परेशान रहती थी ।

ऐसी ही परेशानियों से जूझकर सरला लौटती है। खाना बनाती है।

शाम को घर में प्रवेश करते ही बच्चों को वे दोनों नाकारा होने के लिए डाँटते थे पति और बच्चों की अलग-अलग फरमाइशें पूरी करते-करते बदहवास और चिड़चिड़ी हो जाती है। घर और बाहर के सारे काम उसी की जिम्मेदारी हैं।

थक-हार कर वह अपने जीवन से निराश होने लगती है। उधर पति दिन पर दिन खूंखार होता जा रहा है। बच्चे विद्रोही हो चले हैं।

एक दिन सरला के घर का नल खराब हो जाता है । उसने प्लम्बर को नल ठीक करने के लिए बुलाया ।

प्लम्बर ने आने में देर कर दी। पूछने पर बताया कि साइकिल में पंक्चर के कारण देर हो गई। घर से लाया खाना मिट्टी में गिर गया, ड्रिल मशीन खराब हो गई, जेब से पर्स गिर गया...।

इन सब का बोझ लिए वह नल ठीक करता रहा।

काम पूरा होने पर महिला को दया आ गई और वह उसे गाड़ी में छोड़ने चली गई।

प्लंबर ने उसे बहुत आदर से चाय पीने का आग्रह किया।

प्लम्बर के घर के बाहर एक पेड़ था। प्लम्बर ने पास जाकर उसके पत्तों को सहलाया, चूमा और अपना थैला उस पर टांग दिया।

घर में प्रवेश करते ही उसका चेहरा खिल उठा। बच्चों को प्यार किया, मुस्कराती पत्नी को स्नेह भरी दृष्टि से देखा और चाय बनाने के लिए कहा।

सरला यह देखकर हैरान थी। बाहर आकर पूछने पर प्लंबर ने बताया - यह मेरा परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़ है। मैं सारी समस्याओं का बोझा रातभर के लिए इस पर टाँग देता हूं और घर में कदम रखने से पहले मुक्त हो जाता हूँ। चिंताओं को अंदर नहीं ले जाता। सुबह जब थैला उतारता हूं तो वह पिछले दिन से कहीं हलका होता है। काम पर कई परेशानियाँ आती हैं, पर एक बात पक्की है- मेरी पत्नी और बच्चे उनसे अलग ही रहें, यह मेरी कोशिश रहती है। इसीलिए इन समस्याओं को बाहर छोड़ आता हूं। प्रार्थना करता हूँ कि भगवान मेरी मुश्किलें आसान कर दें। मेरे बच्चे मुझे बहुत प्यार करते हैं, पत्नी मुझे बहुत स्नेह देती है, तो भला मैं उन्हें परेशानियों में क्यों रखूँ । उसने राहत पाने के लिए कितना बड़ा दर्शन खोज निकाला था...!

*दोस्तो, यह घर-घर की हकीकत है। गृहस्थ का घर एक तपोभूमि है। सहनशीलता और संयम खोकर कोई भी इसमें सुखी नहीं रह सकता। जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं, हमारी समस्याएं भी नहीं। प्लंबर का वह ‘समाधान-वृक्ष’ एक प्रतीक है। क्यों न हम सब भी एक-एक वृक्ष ढूँढ लें ताकि घर की दहलीज पार करने से पहले अपनी सारी चिंताएं बाहर ही टाँग आएँ..।*💞💞
Source facebook

*प्रभु की गोद*

*प्रभु की गोद*
.
एक व्यक्ति बहुत नास्तिक था... उसको भगवान पर विश्वास नहीं था...
.
एक बार उसके साथ दुर्घटना घटित हुई.. वो रोड पर पड़ा पड़ा सब की ओर कातर निगाहों से मदद के लिए देख रहा था,
.
पर कलियुग का इंसान - किसी इंसान की मदद जल्दी नहीं करता,
.
मालूम नहीं क्यों, वो यही सोच कर थक गया... तभी उसके नास्तिक मन ने अनमने से प्रभु को गुहार लगाई...
.
उसी समय एक ठेलेवाला वहां से गुजरा उसने उसको गोद में उठाया और चिकित्सा हेतु ले गया
.
उसने उनके परिवार वालो को फ़ोन किया और अस्पताल बुलाया
.
सभी आये उस व्यक्ति को बहुत धन्यवाद दिया... उसके घर का पता भी लिखवा लिया
.
जब यह ठीक हो जायेगा तो आप से मिलने आयेंगे -
.
वो सज्जन सही हो गए... कुछ दिन बाद वो अपने परिवार के साथ उस व्यक्ति से मिलने का इरादा बनाते है और निकल पड़ते है मिलने |
.
वो बाँके बिहारी का नाम पूछते हुए उस पते पर जाते है
.
उनको वहा पर प्रभु का मंदिर मिलता है, वो अचंभित से उस भवन को देखते है, और उसके अन्दर चले जाते जाते है |
.
अभी भी वहा पर पुजारी से नाम लेकर पूछते है की यह बाँके बिहारी कहा मिलेगा -
.
पुजारी हाथ जोड़ मूर्ति की ओर इशारा कर के कहता है की यहाँ यही एक बाँके बिहारी है |
.
खैर वो मंदिर से लौटने लगते है तो उनकी निगाह एक बोर्ड पर पड़ती है उसमे एक वाक्य लिखा दिखता है - कि
.
*इंसान ही इंसान के काम आता है, उस से प्रेम करते रहो मै तो तुम्हे स्वयं मिल जाऊंगा...*🙏🏼
Source- facebook

Tuesday, September 25, 2018

जय श्री कृष्ण

"जय श्री कृष्ण "एक प्रसिद्ध नगर मे भगवान श्री कृष्ण का मंदिर था वही पास मे एक बहुत बडा बाजार भी था मंदिर मे भगवान को मक्खन मिश्री का ही भोग लगता था उसी बाजार मे एक जलेबी वाले ने दुकान खोली ओर सबसे पहले वो जलेबिया बनाकर भगवान को भोग लगाने के लिए ले गया मगर पुजारी ने ये कहकर मना कर दिया कि भगवान को सिर्फ मक्खन मिश्री का ही भोग लगाया जाता हे दुखी मन से जलेबी वाला बाहर आकर गरीबों मे सारी जलेबिया बांट देता हे भगवान श्री कृष्ण भी बालक रूप धारण करके जलेबी लेकर खाते हे उन्हें जलेबी बहुत अच्छी लगती हे शाम को मदिर के कपाट बंद हो जाने के बाद भगवान बालक रुप धारण करके बाजार मे जलेबी वाले के पास पहुंच जाते हे औऱ जलेबी मांगते हे जलेबी वाला पूछता हे कितने पैसों की दू तो बालक श्री कृष्ण कहते हे मेरे पास तो पैसे नही हे जलेबी वाला कहता है तो जलेबी नही मिलेगी इस पर बालक श्री कृष्ण अपने हाथ का कंगन जोकि सोने का होता हे कहकर कि जलेबी तो मे जरूर खाऊगा ये रख लो जलेबी वाला सोने के कंगन को देखकर बोला पर इस बदले कितनी जलेबी दू बालक श्री कृष्ण बोले ये थाली भर दे दो जलेबी वाले ने पूरा थाल भर कर जलेबी दे दी बालक श्री कृष्ण बोले मे ये जलेबी वहाँ बैठकर खालू जलेबी वाला बोला जाओ खालो इसके बाद जलेबी वाला जलेबी बानाने मे बिजी हो गया और बालक वहाँ से आलोप हो गया अगले दिन जब सुबह पुजारी मंदिर मे भगवान की पुजा के लिए आऐ तो देखा कि भगवान के हाथ का कंगन गायब हे मंदिर के सभी लोग भगवान के कंंगन को ढूढने मे लग गये कंगन तो मिला नही जलेबी वाले कि थाली मिल गई जिस पर उसका नाम लिखा था पुजारी अपने सभी साथियों सहित जलेबी वाले के पास पहुंचे ओर उससे पूछा कि तुमहारा थाल मंदिर मे कैसा आया जलेबी वाले ने उन्हें सारी बात बता दी औऱ वो कंगन भी दिखाया जो बालक बने श्री कृष्ण ने उन्हें दिया था पुजारी ने अपने दोनों हाथ ऊपर करके कहा भगवान मैंने आपकी इतनी सेवा की मगर आपके दर्शन नही हूऐ ओर आप ने इस जलेबी वाले को अपने बालक रूपी दर्शन करा दिऐ तभी वहाँ आकाश वाणी हुई भगवान बोले मे हे पुजारी ...मे तो सिर्फ श्रद्धा भाव का भूखा हू मे तो अपने भक्तों के बस मे हू तुम ने इस जलेबी वाले का मन ये कहकर दुखाया कि मे सिर्फ मकखन मिश्री खाता हूं जबकि मे तो अपने भक्त के प्यार का भूखा हूं..कहकर आवाज लुप्त हो गई मित्रों सचमुच प्रभु प्यार और भाव के भूखे होते है और हम सभी उन्हें दिखावे के जरिये रिझाने की कोशिश मे रहते है अपने प्रभु से मन से श्रद्धा भाव से प्रेम कीजिए उन्हें पाने का एक यही उपाय है
जय श्री कृष्ण

हर किसी को वो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए

बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में एक किसान रहता था . वह रोज़ भोर में उठकर दूर झरनों से स्वच्छ पानी लेने जाया करता था_.
इस काम के लिए वह अपने साथ दो बड़े घड़े ले जाता था , जिन्हें वो डंडे में बाँध कर अपने कंधे पर दोनों ओर लटका लेता था*
_उनमे से एक घड़ा कहीं से फूटा हुआ था ,और दूसरा एक दम सही था . इस वजह से रोज़ घर पहुँचते -पहुचते किसान के पास डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था .ऐसा दो सालों से चल रहा था_.
सही घड़े को इस बात का घमंड था कि वो पूरा का पूरा पानी घर पहुंचता है और उसके अन्दर कोई कमी नहीं है , वहीँ दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि वो आधा पानी ही घर तक पंहुचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार चली जाती है
फूटा घड़ा ये सब सोच कर बहुत परेशान रहने लगा और एक दिन उससे रहा नहीं गया उसने किसान से कहा ,“ मैं खुद पर शर्मिंदा हूँ और आपसे क्षमा मांगना चाहता हूँ ?”_
_“क्यों ? “ किसान ने पूछा , “ तुम किस बात से शर्मिंदा हो ?”__
शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूँ , और पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी घर पहुँचाना चाहिए था बस उसका आधा ही पहुंचा पाया हूँ , मेरे अन्दर ये बहुत बड़ी कमी है , और इस वजह से आपकी मेहनत बर्वाद होती रही है .”, फूटे घड़े ने दुखी होते हुए कहा.
_किसान को घड़े की बात सुनकर थोडा दुःख हुआ औ वह बोला , “ कोई बात नहीं , मैं चाहता हूँ कि आज लौटते वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को देखो .”_
घड़े ने वैसा ही किया , वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया , ऐसा करने से उसकी उदासी कुछ दूर हुई पर घर पहुँचते – पहुँचते फिर उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था, वो मायूस हो गया और किसान से क्षमा मांगने लगा
_किसान बोला ,” शायद तुमने ध्यान नहीं दिया पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे वो बस तुम्हारी तरफ ही थे , सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था . ऐसा इसलिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था , और मैंने उसका लाभ उठाया . मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर रंग -बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे , तुम रोज़ थोडा-थोडा कर के उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना दिया . आज तुम्हारी वजह से ही मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता हूँ और अपना घर सुन्दर बना पाता हूँ . तुम्ही सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता ?”_
दोस्तों हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है , पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं . उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को वो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए और उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिए, और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी “अच्छे घड़े” से मूल्यवान हो जायेगा
अपनी कमजोरी में अपना बल छुपा है

Featured Post

हमारे साथ श्री रघुनाथ, फिर किस बात की चिंता।

  बीते दिनों बेटे का टूर्नामेंट था। आयोजन नोएडा के एक प्रतिष्ठित स्कूल में था।  हम दोनों बाप बेटा एक लंबी ड्राइव के बाद आयोजन स्थल पर पहुंचे...