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Sunday, September 14, 2025

सिंह और गाय

 


एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया।घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए। 

दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढ़ते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।गाय समर्पित हृदय का प्रतीक है।बाघ अहंकारी मन है।मालिक सद्गुरु का प्रतीक है।कीचड़ यह संसार है।और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

ॐ श्री गुरुवे नमः

Thursday, February 20, 2025

एक तांत्रिक की रचनाये

मैं यहाँ पर एक अघोरी द्वारा लिखी हुई तंत्र से संबंधित घटनाओं को आपके लिए लेकर आया हूँ। ये सभी घटनाएँ काफी रोचक हैं। आपको इनको पढ़कर बहुत आनंद आएगा। प्रस्तुत की जा रही घटनाएँ किसी अन्य वेबसाइट से कॉपी की गई हैं, और इनका श्रेय मूल लेखक को जाता है।

प्रस्तुत की जा रही घटनाएँ काल्पनिक हैं या नहीं, इसका निर्णय पाठक स्वयं कर सकते हैं।

धन्यवाद।


Monday, September 24, 2018

डायन



हरेक इंसान की जिन्दगी इतनी खुशनसीब नहीं होती कि वह एक अच्छे संपन्न घर कुल खानदान में पैदा हो । पढाई लिखाई करके प्रतिष्ठित इंसान बने । प्यारी सी बीबी और दुलारे से बच्चे हों । और जिन्दगी को हँसी खुशी भोगता हुआ परलोक रवाना हो जाय ।
पर क्यों नहीं होती ऐसी जिन्दगी ? क्यों हैं जीवन के अलग अलग विभिन्न रंग । कोई सुखी । कोई दुखी । कोई हताश । कोई निराश क्यों है ? यह प्रश्न ठीक गौतम बुद्ध स्टायल में नीलेश के मन में उठा ।
पर इसका कोई जबाब उसके पास दूर दूर तक नहीं था । नीलेश की तुलना मैंने गौतम बुद्ध से इसलिये की । क्योंकि चाँदी की थाली और सोने की चम्मच में पहला निवाला खाने वाला नीलेश एक बेहद सम्पन्न घराने का स्वस्थ सुन्दर होनहार युवा था । जीवन के दुखों कष्टों से उसका दूर दूर तक वास्ता न था । जिस चीज पर बालापन से ही उसकी नजर उत्सुकतावश भी गयी । वो चीज तुरन्त उसको हाजिर की जाती थी । आज की तारीख में ढाई तीन लाख रुपया महज जिसका पाकेट मनी ही था । महँगी महँगी गाङिया वह सिर्फ़ ट्रायल बतौर खरीदता था । और बहुतों को रिजेक्ट भी कर देता था ।
वह नीलेश ! नीलेश द ग्रेट ! जब अपने जीवन में इस प्रश्न से परेशान हुआ । तो महज 10 वीं क्लास में था ।
और राजकुमार सरीखा ये बच्चा अनगिनत दोस्तों से सिर्फ़ इसीलिये घिरा रहता था कि उसकी छोटी सी जेव से रुपया कागज की तरह उङता था । लङकियाँ तो उसकी हर अदा की दीवानी थी ।
पर ढेरों दोस्तों से घिरे नीलेश को उस कालेज में दो ही लोग आकर्षित करते थे । दादा प्रसून और मानसी ।
उससे दो क्लास आगे प्रसून नाम का वो लङका । अक्सर उसे किसी पेङ की ऊँची टहनी पर बैठा हुआ नजर आता।
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Sunday, September 16, 2018

कुदरत का इंसाफ


कुदरत का इंसाफ

रात का अँधेरा चारों और फ़ैल चुका था । रजनी के काले आँचल में चमकते चाँदी के मोतियों से झिलमिलाते सितारे एक लुभावना दृश्य पैदा कर रहे थे । इस पहाङी की सुरम्य गोद में बहती ठण्डी शीतल हवा तन मन को बेहद सुकून सा पहुँचा रही थी । काली गहरी रात का ये रंगीन मौसम हर प्रेमी जोङे को एक दूसरे की बाँहों में समा जाने के लिये प्रेरित कर रहा था । पर प्रसून इस खुशनुमा माहौल में बैचैनी से करवटें बदल रहा था । उसका सारा बदन किसी दहकती भट्टी के समान तप रहा था ।
-
माँ ! उसके मुँह से कराह सी निकली - तू कहाँ है । आज मुझे तेरी बहुत याद आ रही है । आज मुझे तेरी बहुत जरूरत महसूस हो रही है । मेरे पास आ ना माँ । मुझे अपने ममता के आँचल में सुला ले ।
वह चारपाई से उठकर बैठ गया । उसकी उदास सूनी सूनी आँखों में से आँसू मोती बनकर गालों पर आ रहे थे । वह पिछले तीन दिनों से तेज बुखार में जल रहा था । और खुद को बेहद अकेला महसूस कर रहा था । आज उसे अपना बचपन याद आ रहा था । माँ की ममतामयी गोद याद आ रही थी । वह सोच रहा था । किसी जादू की तरह माँ उसके करीब होती । और वह उसके आँचल में छुपकर किसी मासूम बच्चे की भांति सो जाता । उसने सोचा । सच है माँ ..माँ ही होती है । उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता ।
वह जी भर के किसी बच्चे की भांति फ़ूट फ़ूट कर रोना चाहता था । माँ के सीने से लग जाना चाहता था । पर माँ नहीं थी । दूर दूर तक नहीं थी । उसने उँगलियों से खुद ही अपने बहते हुये आँसुओं को पोंछा । और रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । रात के 9 बजने ही वाले थे ।




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Sunday, September 9, 2018

अँधेरा


पंजाब का एक शहर गुरदासपुर । प्रकृति की अदभुत सुन्दरता और पंजाब की मिट्टी से उठती सोंधी सोंधी खुशबू को देखकर निश्चित ही कोई भी कह सकता था कि प्रकृति की देवी प्रथ्वी के इस हिस्से पर खास मेहरवान ही है ।
हरे भरे खेतों में लहराती युवा अल्हङ मदमस्त जवानी सी फ़सलें बुझे दिलों की भी उमंगे जवान करने वाली थी । इस इलाके की आबादी औसत यानी न बहुत कम और न बहुत ज्यादा थी । अधिकतर जनता खेती बाङी करती थी । और किसी न किसी रूप में खेती से जुङी थी । झूठी 21 सेंचुरी की आधुनिक कल्पना के मुँह पर करारा तमाचा सा मारते हुये यहाँ अधिकतर घरों में अभी भी गाय भैंसे आराम से देखी जा सकती थी । गुरुदासपुर की औरतें पूरे पंजाब में सबसे खूबसुरत होती हैं । शुद्ध हवा पानी और स्वस्थ जीवन का मूलमन्त्र असली शुद्ध घी दूध दही छाछ लस्सी का प्रचुर मात्रा में सहज उपलब्ध होना । उन्हें भरपूर औरत में बदल देता था । और इसीलिये पंजाब की हर छोरी एकदम तेजी से जवानी की ओर बढती थी । मानों पतंग की तरह बङती ही चली जा रही हो ।


by Rajeev shreshtha

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तांत्रिक पुजारन

 मित्रो इन्टरनेट पे एक जबरजस्त मोलिक थ्रिलर रोमांचकारी स्टोरी लिखी जा रही है.......लेखिका का नाम ओदोलो चम्पा है ,क्या जबरजस्त स्टोरी लिखी है इनहोने आप भी गोर फरमाये ---- 

 मुझे आज भी वह दिन याद है | मुझे बस उस दिन ऑफीस जाना था और उसके बाद मैं एक लंबी छुट्टी पर जाने वाली थी | मैने किसी को कुछ नही बताया था, सोचा था कीसब दोस्तों और सहेलियों को एक सर्प्राइज़ दूँगी- काफ़ी दिनो वह लोग मेरे साथ मिलकर एक पार्टी का प्लान बना रहे थे लेकिन मेरे पास टाइम ही नही होता था, क्या करू; मैं अब काम करने लगी थी और मेरे ज़्यादा तर दोस्त अभी कॉलेज मे ही थे- लेकिन किस्मत मे कुछ और ही लिखा था |

खैर, आज सुबह उठने मे काफ़ी देर हो गई थी, इसके लिए मैं मौसम को ज़िम्मेदार ठहराउंगी, कल रात से ज़ोरदार बारिश हो रही थी और बिजली कड़क रही थी, इस लिए मैं जल्दी जल्दी नहा धो कर तैयार हो गई पर मुझे ड्राइयर से बाल सूखने का मौका नही मिला, इसलिए मैने अपने अध गीले बालों का एक ढीला सा जुड़ा बनाया और एक अच्छी सी साड़ी और मैचिंग ब्लऊज पहन कर अपना पर्स और एक छतरी लेकर निकल पड़ी ट्रेन पकड़ने |



स्टेशन के रास्ते मे फूटपाथ पर लगी खाने की दुकानो मे से ज़्यादा तर अभी खुले ही नही थे, पर चाय की दुकाने खुल चुकी थी, बरसात के मौसम मे गरम चाय की चुस्कियों का मज़ा ही कुछ और होता है,लेकिन मुझे थोड़ी हिचक महसूस हो रही थी | क्योंकि चाय की दुकानो मे खड़े लोग निम्न वर्ग के थे और मुझे घूर रहे थे, इसमे उनका भी क्या दोष? मेरी उम्र तो सिर्फ़ इक्कीस साल की थी, लोग बाग और दोस्तों के अनुसार मेरा फिगर भी अच्छा है और मैं दिखने में भी खूबसूरत हूँ, और चलते वक़्त हर कम पर मेरे स्तन थिरक रहे थे मानो मेरी चड़ती जवानी का रस छलका रहें हों ..कुछ भी हो अभी चाय के लिए वक़्त भी नही था, अगर मैं चाय के लिए स्टेशन के स्टॉल मे भी रुकी तो मेरी ७:२० की ट्रेन छूट जाएगी | मैने घड़ी देखी और तेज़ कदमो से स्टेशन की ओर बढ़ने लगी |


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पिशाच का बदला

दोस्तों ये कहानी अंतर्जाल से ली गई है
16 June 2007, 63 वर्षीय साहिब सिंह वर्मा मजबूत कद काठी वाले धनाडय व्यक्ति थे । 42 सदस्यों वाले साहिब सिंह का संयुक्त परिवार और उनका अमीरी रहन सहन पुराने जमाने के किसी जमीदार की याद दिलाता था ।
साहिब सिंह खुद लेखपाल पद पर सरकारी नौकरी कर चुके थे । और उनके आठ पुत्र भगवान की कृपा से पुलिस । इनकम टेक्स । इंजीनियर जैसे पदों पर नौकरियां कर रहे थे । कुल मिलाकर पैसा उनके यहां आता नहीं था । बल्कि बरसता था । नौकरी के अलावा खेती । ट्रेक्टर और ट्रकों से उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती थी ।
साहिब सिंह से मेरी मुलाकात । मानसी विला । पर कुछ ही देर पहले शाम तीन बजे हुयी थी । पांच हजार वर्ग मीटर जगह में बना मानसी विला चार मंजिला महल के जैसा था । जिसके ऊपर की तीन मंजिले आफ़िस के उद्देश्य से किराये पर उठी हुयी थी ।
और ग्राउंड फ़्लोर पर दो हजार वर्ग मीटर में बना सेपरेट पोर्शन नीलेश दी ग्रेट के निजी प्रयोग के लिये था । शेष तीन हजार वर्ग मीटर की भूमि आफ़िसों के वाहन आदि के उद्देश्य से बनी थी ।
नीलेश मेरा मित्र और एक अच्छा साधक था । मानसी उसकी प्रेमिका का नाम था । मानसी विला में नीलेश के परिवार का कोई भी सदस्य नहीं रहता था । उसकी देखभाल के लिये महादेव और ऊषा नामक दम्पत्ति नियुक्त थे । जो आसाम के रहने वाले थे ।
मानसी विला की उपरली तीन मंजिलो से ढाई लाख रुपया मंथली किराया आता था । जो नीलेश दी ग्रेट की पाकेट मनी के काम आता था । इस सबके बाबजूद मानसी विला पर मेरा या नीलेश का मिलना ईद के चांद जैसा ही था ।










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Saturday, September 8, 2018

प्रेतकन्या

दोस्तों ये कहानी अंतर्जाल से ली गई है



 ये बात लगभग बीस साल पुरानी होगी । संजय मेरा दोस्त था । हम दोनों एक ही कालेज में थे । पर मैं उससे एक क्लास आगे था ।इसके बाबजूद मेरी उससे मित्रता थी । संजय और उसका परिवार किसी अन्य प्रदेश से थे ।और नौकरी की वजह से उत्तर प्रदेश में रहने के लिये आ गये थे ।
जाने क्या वजह थी । संजय मुझे बहुत दिनों से दिखायी नहीं दिया था । शायद इसकी एक वजह ये भी हो सकती थी कि मैं स्वयं कालेज के बाद अपने शोध हेतु वन क्षेत्र के एक निर्जन और गुप्त स्थान पर चला जाता था । और प्रायः घर और शहर में कम ही रहता था ।  लेकिन उस दिन जब मैं बाजार में था । मुझे संजय की मम्मी रजनी आंटी की आवाज सुनायी दी - हेय प्रसून ! क्या ये तुम
हो..जरा सुनो । मैंने स्कूटर रोक दिया । रजनी आंटी मेरे करीब आ गयी । वे
बेहद उदास नजर आ रही थी । - संजय कैसा है । और आजकल दिखायी नहीं देता ? मैंने
आंटी से पूछा । - मैंने उसी के बारे में बात करने के लिये तुझे रोका है । तुमने एक बार बताया था कि तुम वनखन्डी गुफ़ा में रहने वाले बाबा से परिचित हो । और अक्सर वहाँ आते जाते भी रहते हो ।
प्लीज प्रसून ! मैं बाबाजी से मिलना चाहती हूँ । तुम्हारे दोस्त
की खातिर । अपने बेटे की खातिर । मामला सीरियस था । आंटी डरी हुयी सी प्रतीत होती थी ।
मुझे आश्चर्य था कि आज वे बाबाजी के बारे पूछ रही थी । और कभी इस पूरे परिवार ने मेरी हंसी इस बात को लेकर बनायी थी कि दृश्य जगत के अलावा भी कोई अदृश्य जगत है ।
- आप मुझे कुछ तो हिंट दें । मैंने कहा - बाबा.. यूं एकाएक किसी से नहीं मिलते । और आप जिस वजह से बाबा से मिलना चाहती हैं । वह उचित है भी । या नहीं ?
आंटी ने मुझे भीङ से हटकर एक तरफ़ आने का इशारा किया । और एकान्त में आते ही बोली - प्रसून ! तीन महीने से संजय कुछ अजीब......मेरे बेटे को किसी तरह उससे बचा लो ?मामला वाकई गम्भीर था । मैंने पूछा - संजय अक्सर कहाँ मिलता है ?
थी कि दृश्य जगत के अलावा भी कोई अदृश्य जगत है ।
- आप मुझे कुछ तो हिंट दें । मैंने कहा - बाबा.. यूं एकाएक किसी से नहीं मिलते । और आप जिस वजह से बाबा से मिलना चाहती हैं । वह उचित है भी । या नहीं ?








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by Rajeev shreshtha
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सन्यासी (तन्त्र-मन्त्र की दुनिया )

सन्यासी



इसमें लिखे गए सभी वृतांत काल्पनिक है और केवल मेरे मित्रो के मनोरंजन के उद्देश्य से लिखे गए है
रात के सवा बारह का समय था। अमावश्या की काली रात थी। सुनसान सड़क पर हमारी हार्ड टॉप जिप्सी फर्राटे भरती हुवी यमुना के किनारे की सड़क पर भागी जा रही थी। सड़क पर निशाचर जीव जन्तुवो का भी नामो निशान नहीं था। शायद दिन भर मई की धुप के थपेड़े खा के सभी अपने रेन बसेरो में आराम कर रहे थे। जिप्सी की हेडलाइट में कुछ कीट अवश्य अपनी उपस्थित दर्ज करके मानो ये इंगित करने की कोशिश कर रहे थे की हम इलाहाबाद का शहरी इलाका छोड़ अब बियावान के हवाले है। बुजुर्ग ड्राइवर प्रह्लाद सिंह यादव जी की चौकस निगाहे सड़क पे जमी हुवी थी। ६२ साल की उम्र में भी वो बुजुर्ग फौजी दम ख़म और हिम्मत में आज के सामान्य जवानों को मात देते लगते थे। 
शहरी छेत्र में सड़क थोड़ी अच्छी थी तो मैंने और दमन सिंह ने थोड़ी झपकी ले ली थी। बस अब तो खुली आँखों से सड़क के गड्ढों के हवाले थे कुछ अपने मित्र दमन सिंह के बारे में बता दू। मेरे हम उम्र हम प्याला हम निवाला मेरे जिगरी दोस्त। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के पढ़ाई के दौरान शुरू हुवी दोस्ती कब प्रगाढ़ होती चली गईपता ही न चला। उन्होंने इतिहास से MA किया फिर कुछ और करने को न था तो पीएचडी भी कर डाली। अभी भारत के पुरततव विभाग ने बड़े अफसर है। प्राचीन इतिहास के सम्बन्द में खोज का अच्छा अनुभव रखते है.! परा मानवीय विषयों में खासी दिलचस्पी रखते है। 
दमन सिंह पूरा नाम श्री रिपुदमन सिंह अपने नाम के अनुरुप थोड़ा गुसैल स्वाभाव के है। हा मूड में हुवे तो हँसा हँसा के पेट में दर्द पैदा कर दे। बस ईश्वर ने दुनिया पर एक ही उपकार किया। वो कहते है न भगवन गंजे को नाख़ून नहीं देता। महाशय एक दम सिकिया पहलवान के सगे भाई प्रतीत होते हैगुसैल स्वाभाव। किसी की बात सहन करना आता ही नहीं महोदय को। वो तो अपनी हेल्थ से मात खा जाते है नहीं तो क्रुद्ध हो गए तो जलजला ही ला दे सरकार।
दमन सिंह ने ही मुझे काशी से बुलाया था। उन्हें खबर मिली थी की मिल्कीपुर के शमशान के आस पास एक सिद्ध बाबा को भटकता देखा गया है। पैरानॉर्मल विषय में दिलचस्पी और उनकी जिज्ञासा उन्हें मुझे फ़ोन करने पर मजबूर कर गई । तंत्र मंत्र के मेरे शोध की दिशा में कुछ ज्ञानार्जन की अभिलाषा में में भी भागा चला आया। इन विषयों पे दमन कभी अकेले आगे नहीं बढ़ाते। में भी अपंने तंत्र मंत्र के शोध सम्बंधित अभियानों पर सदा उनका साथ चाहता हु।
 
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prem-sagar
 





Monday, August 27, 2018

अगिया वेताल





जून 1988

शाम का अंधेरा तेजी से गहराता जा रहा था । आजकल कृष्ण पक्ष होने से अंधेरे की कालिमा और भी अधिक होती थी । चलते चलते अचानक रूपा ने कलाई घङी में समय देखा । सुई आठ के नम्बर से आगे सरकने लगी थी । पर कोई चिन्ता की बात नहीं थी । उसे सिर्फ़ दो किमी और जाना था ।
भले ही यह रास्ता वीरान सुनसान छोटे जंगली इलाके के समान था । पर उसका पूर्व परिचित था । अनेकों बार वह अपनी सहेली बुलबुल शर्मा के घर इसी रास्ते से जाती थी । इस रास्ते से उसके और बुलबुल के घर का फ़ासला सिर्फ़ चार किमी होता था । जबकि सङक के दोनों रास्ते 11 किमी दूरी वाले थे । अतः रूपा और बुलबुल दोनों इसी रास्ते का प्रयोग करती थी ।
यह रास्ता पंजामाली के नाम से प्रसिद्ध था । पंजामाली एक पुराने जमाने की विधि अनुसार ईंटो का भट्टा था । जिसमें कुम्हार के बरतन पकाने की विधि की तरह ईंटों को पकाया जाता था । इसी भट्टे के मालिक से पंजामाली कहा जाता था । और इसी भट्टे के कारण इस छोटे से वीरान क्षेत्र को पंजामाली ही कहा जाता था । पंजामाली भट्टे से डेढ किमी आगे नदी पङती थी । और उससे एक किमी और आगे रूपा का घर था ।
हांलाकि बरसात का मौसम शुरू हो चुका था । पर पार उतरने वाले घाट पर अभी नदी में घुटनों तक ही पानी था । नदी के पानी को लेकर रूपा को कोई चिंता नहीं थी । क्योंकि वह भली भांति तैरना जानती थी ।
खेतों के बीच बनी पगडण्डी पर लम्बे लम्बे कदम रखती हुयी रूपा तेजी से घर की ओर बङी जा रही थी । उसे घर पहुँचने की जल्दी थी । तेज अंधेरे के बाबजूद स्थान स्थान पर लगे बल्ब उसको रास्ता दिखा रहे थे । हालांकि चलते समय बुलबुल ने उसे टार्च दे दी थी । पर रूपा को उसकी कोई आवश्यकता महसूस नहीं हो रही थी ।
अचानक रूपा का दिल धक से रह गया । उसकी कल्पना के विपरीत लाइट चली गयी । और तेजी से बादल के गङगङाने की आवाज सुनाई दी । लाइट के जाते ही चारों तरफ़ घुप अंधेरा हो गया ।



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समाप्त

by Rajeev shreshtha
Credit- hindivicharmunch/xman

Tuesday, August 21, 2018

भूत-प्रेत की कहानियाँ

 भूत-प्रेत की कहानियाँ

 अन्तरजाल से संकलित


एक गाँव मैं एक औरत के कोई बच्चा नहीं था! वह औरत गांव के मुखिया की पत्नी थी उसके शादी को काफी समय हो गया था! सब लोग उसे बाँझ कहा करते थे!सारे गाँव वाले उसका मुंह भी नहीं देखना कहते थे कहते थे कि इसका मुंह देख लिया तो पूरा दिन बेकार चला जायेगा पर मुखिया कि पत्नी थी इसलिए लोग थोड़ी बहुत बात चीत कर लिया करते थे!एक दिन गांव मैं एक फकीरा बाबा भिक्षा मांगते हुए आ पहुँचता है तो वह बतों ही बातों मैं उसका हाथ देखने लग जाता है! और कहता है आपको बच्चा नहीं है ना वह बोली आपको कैसे पता चला वह बोला हम हस्त रेखा मैं निपुण है और हाथ देखकर यह बता सकते हैं कि क्या होने वाला है क्या होगा वह बोली अच्छा तो यह बताओ कि मेरे बच्चा कब होगा तो उसने कहा आपको भगवान् ने बच्चा तो नहीं दिया पर मैं एक रास्ता बताता हूँ!वह सुनो अमावस्या की रात को किसी एक ऐसे लड़के कि बलि पीपल के पेड़ के नीचे दो!जो अपने माँ बापके एकलोता पुत्र हो औरउसके खून से अपने बाल धोना फिर कहना ए प्यासी आत्माओ यह बलि मेरी तरफ से स्वीकार करो और मुझे एक पुत्र दे दो!एक लोटे मैं उस कुए का पानी भर कर उस मैं उसके सरीर की दो बून मिला कर खुद पी लेना और उस लड़के के सिर के बाल अपनी साडी की गांठ मैं बंधे रखना तो युम्हे अवस्य एक पुत्र पैदा होगा इतना कहकर वह वहां से भिक्षा लेकर चला गया! उस दिन के ठीक तीन दिन बाद अमावश्या थी उस औरत ने वही किया जो उस बाबा ने बताया था उसने अपने देवरानी के लड़के कि बलि दे दी और खून की दो बूंदे पानी मैं मिलाकर खुद पी लिया और उस सिर के कुछ बाल को काटकर अपनी गांठ मैं बांध लिया और बिना पीछे मुड़े अपने घर आ गयी सुबह गांव बालों को पता चला कि मुखिए के भाई के बेटे को किसी ने मार के वहां फेक रखा है





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