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Friday, May 1, 2026

हमारे साथ श्री रघुनाथ, फिर किस बात की चिंता।

  बीते दिनों बेटे का टूर्नामेंट था। आयोजन नोएडा के एक प्रतिष्ठित स्कूल में था। 

हम दोनों बाप बेटा एक लंबी ड्राइव के बाद आयोजन स्थल पर पहुंचे। 

स्कूल की चकाचौंध देखते ही बनती थी। 

बेटा बड़े गौर से इर्द गिर्द देख रहा था। वह महसूस कर रहा था के वह एक अजनबी जगह पर अजनबी लोगों के बीच आ गया है। 

अंडर 13 ऐज ग्रुप में उसका पहला मैच उसी स्कूल के लड़के के साथ था। 

उसके चेहरे से झलक रहा था के उस नए माहौल में वह दबाव में है। 




नई जगह पर जा कर एडेप्ट होने में समय लगता है और 11 साल के बालक के लिये तो स्वयं को उन परिस्थितियों में एक दम से ढाल लेना मुश्किल था। 


मैच शुरू हुआ और दबाव खेल पर झलकने लगा। विपक्षी हावी हो रहा था और उसके फेवर में दबा कर हूटिंग हो रही थी। 

बेटा मैच हार गया। 


उस दिन लीग सिस्टम के हिसाब से कुल 4 मैच होने थे अभी 3 मैच शेष थे। 


झल्लाहट और गुस्सा ऊसके चेहरे से टपक रहा था। झल्लाहट आंसुओं में तब्दील हो रही थी। 

मैं पास खड़ा था और उसके शांत होने का इंतजार कर रहा था। 

उसने घूंट भर पानी पिया। 

मैंने उसे सहलाया। 

कुछ मिनट बाद मैंने उससे पूछा के हार का क्या कारण रहा। 


कुछ समय वह निशब्द खड़ा रहा। फिर बोला "नया कोर्ट है, कुछ समझ में नहीं आया"


मैं उसके बताने से पहले ही समझ चुका था के नई जगह और एक दम से एडेप्ट करने में उसे झिझक हो रही है।  


हम देसी आदमी हैं। परिस्थिति विकट होती है तो #राम याद आते हैं। 


बातों बातों में मुंह से निकल गया "लंका भी तो राम जी के लिये नई जगह थी ? राम जी तो प्रेशर में ना आये। उलटा रावण को ही उसके होम ग्राउंड पर पछाड़ दिया"

बेटे ने मेरी ओर देखा। 


"और हिमालय, जब बजरंग बलि हिमालय गए, संजीवनी लेने तो उनके लिये भी तो हिमालय नया कोर्ट था ? नया ग्राउंड था?"


"वो तो भगवान थे" लड़के ने सुबकते हुए कहा। 


"तो हम उनके भक्त हैं" अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया। 


अगले कुछ समय में हमने अगले 3 मैच के विषय पर चर्चा की। 


पीठ ठोकने या तारीफ के लिये नहीं कह रहा लेकिन अगले 3 मैच लड़के ने एकतरफा जीते। ना माथे पर शिकन ना दिल में डर। निर्भीक, निडर हो कर खेला। बिंदास होकर खेला। 

उस मैदान को उस कोर्ट को, अपना कोर्ट समझ कर खेला। उसकी जीत उसके खेल में नहीं थी, वह समझ रहा था के वह संजीवनी खोजने निकला है और खाली हाथ वापिस नहीं आ सकता। 

उसकी जीत इस विचार में थी जो उसके मन मस्तिष्क में कौंध रहा था। 


 

कौन कहता है #राम केवल #रामायण में हैं, जीवन के हर कदम पर हर परिस्थिति में राम हमारा हाथ पकड़ कर चल रहे हैं। 


हमारे साथ श्री रघुनाथ, फिर किस बात की चिंता। 

शरण में रख दिया जब माथ, फिर किस बात की चिंता।।


पोस्ट साभार 🙏

Sunday, September 14, 2025

सिंह और गाय

 


एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया।घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए। 

दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढ़ते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।गाय समर्पित हृदय का प्रतीक है।बाघ अहंकारी मन है।मालिक सद्गुरु का प्रतीक है।कीचड़ यह संसार है।और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

ॐ श्री गुरुवे नमः

Saturday, February 15, 2025

क्यूटनेस ओवरलोडेड

 कहानी- क्यूटनेस ओवरलोडेड



डॉ. स्मिता वैसे भी कोई कॉन्फ्रेंस, सेमिनार आदि नहीं छोड़ती थी. फिर इस बार तो कॉन्फ्रेंस उनके छोटे भाई के शहर में थी. मां से मिलने का यह सुनहरा अवसर वह भला कैसे छोड़ सकती थी? शादी के बाद से ही नीलेश और पल्लवी उसे बुला रहे हैं. पर आजकल हर कोई अपने काम में इतना मसरूफ़ है कि बिना काम कहीं जाने का व़क्त निकाल ही नहीं पाता. तभी तो पति निशांत ने भी साथ चलने से इंकार कर दिया था. “नहीं बाबा, तुम्हारी गायनाकोलॉजिस्ट मीट में मेरा क्या काम? मैं अपना क्लीनिक ही देखना पसंद करूंगा.” स्मिता का उत्साह इससे ज़रा भी कम नहीं हो पाया था. ‘मायका’ शब्द मात्र से स्त्रियों में भर जानेवाली ऊर्जा से वह भी अछूती नहीं थी. भाई-भाभी के लिए उपहार ख़रीदने के बाद उसने मां के लिए भी एक सुंदर-सी गरम शॉल ख़रीद ली थी. वज़न में हल्की, आरामदायक हल्के रंग की यह शॉल मां को अवश्य पसंद आएगी. 


कल्पना में शॉल ओढ़े सैर के लिए निकलती मां का चेहरा आंखों के सामने आया, स्मिता के चेहरे पर स्वतः ही स्मित मुस्कान बिखर गई. मां तो उसे देखकर ही उल्लासित हुई थीं, छोटे भाई नीलेश और नई भाभी पल्लवी ने भी उसे हाथों हाथ लिया, तो स्मिता का मायके आने का उत्साह द्विगुणित हो गया. नाश्ते में मां ने उसकी मनपसंद बेडमी पूरी बनाकर परोसी, तो स्मिता के मुंह में पानी भर आया. इससे पूर्व कि वह ढेर सारी पूरियां अपनी प्लेट में रख पाती, उसके मोबाइल पर कोई आवश्यक कॉल आ गई. वह मोबाइल लेकर थोड़ा दूर हटकर बतियाने लगी, पर उसकी नज़रें डायनिंग टेबल पर ही जमी थीं. मां उठकर अपने हाथों से नीलेश की प्लेट में पूरियां परोसने लगीं, तो नीलेश ने झटके से प्लेट हटा ली. “क्या कर रही हो मां? जानती तो हो मैं डायट पर हूं. पल्लवी मेरे लिए दो टोस्ट पर बटर लगा दो.” “ला, मैं लगा देती हूं. उसे नाश्ता करने दे. उसे भी तो ऑफिस निकलना है.” मां ने अपना नाश्ता छोड़कर उसके लिए टोस्ट पर बटर लगा दिया था. लेकिन ढेर सारा बटर देख नीलेश फिर भड़क उठा था. “इतना सारा बटर! मां तुम रहने दो. पल्लवी, मैंने तुम्हें लगाने को कहा था.” “हूं... हां!” सहमी-सी पल्लवी ने अपना दूध का ग्लास रख तुरंत दूसरे टोस्ट पर हल्का-सा बटर लगा दिया था और नीलेश की प्लेट में रख दिया था. 


तब तक स्मिता भी फोन पर वार्तालाप समाप्त कर डायनिंग टेबल पर आ चुकी थी. सब चुपचाप नाश्ता करते रहे. स्मिता ने चाहा पूरियों की तारीफ़ कर वह वातावरण को हल्का बना दे, पर मां का उतरा चेहरा देखकर उसने चुप रह जाना ही श्रेयस्कर समझा. शाम को जल्दी लौटने का आश्‍वासन देकर तीनों निकल गए थे. रात का खाना कुक ने ही बनाया था. सबने साथ बैठकर खाया. स्मिता ने खाने की तारीफ़ की, साथ ही मां के हाथ की उड़द दाल, चावलवाली तहरी खाने की इच्छा भी ज़ाहिर की. “पल्लवी, पता है मां साबूत उड़द और चावल की इतनी खिली-खिली तहरी बनाती हैं कि देखकर ही दिल ख़ुश हो जाता है. उसमें ढेर सारे घी वाला साबूत लाल मिर्च और जीरे का तड़का! उफ़्फ़! मेरे तो अभी से मुंह में पानी आने लगा. मैंने कई बार बनाने का प्रयास किया, पर वो मां वाला स्वाद नहीं ला पाई.” स्मिता पल्लवी को विस्तार से रेसिपी समझाने लगी. फिर अंत में यह और जोड़ दिया, “नीलेश को भी बहुत पसंद हेै यह डिश. क्यों नीलेश?” “हां बिल्कुल! बनाओ न मां!” मोबाइल पर व्यस्त नीलेश ने संक्षेप में सहमति दे दी थी. अगले दिन स्मिता को देर से जाना था, इसलिए वह अभी तक सो ही रही थी. कानों में नीलेश के ज़ोर से बोलने का स्वर पड़ा, तो उसकी आंख खुल गई. 


 “यह मेरे पसंदीदा शर्ट का क्या कबाड़ा कर दिया है पल्लवी तुमने? स़फेद को आसमानी कर दिया है. आजकल कौन नील लगाता है?” पल्लवी सकपकाई-सी खड़ी थी. तभी मां आ गईं, “अरे, तेरे सारे स़फेद कपड़ों पर कल मैंने नील लगाई थी. याद नहीं, तू कितनी गहरी नीलवाले कपड़े पहनता था? पूरे नीले ही करवा लेता था. यह तो मैंने बहुत हल्की लगाई है, ताकि ऑफिस में ख़राब न दिखे.” नीलेश ने झुंझलाहट में शर्ट पलंग पर फेंक दी थी और पल्लवी से आलमारी में से दूसरी शर्ट देने को कहा. मां निढाल-सी लौट आई थीं. उनकी बेचारगी देख स्मिता की आंखें गीली हो गई थीं. मां का हाथ अपने हाथों में ले वह कहे बिना नहीं रह सकी थी, “क्यों करती हो मां यह सब? जब किसी को आपकी, आपके काम की, आपकी भावनाओं की कद्र ही नहीं है...” “मैं नहीं करती बेटी! मेरी ममता मुझसे यह सब करवा लेती है. 


मैं तो उन लोगों की मदद करना चाहती हूं. मेरा आत्मसम्मान मुझे किसी पर बोझ बनकर रहने की इजाज़त नहीं देता. पर क्या करूं? सब उलट-पुलट हो जाता है.” “नीलेश-पल्लवी भी तुम्हें आराम देना चाहते हैं मां! घर में इतने नौकर-चाकर हैं तो सही. फिर अब तो पल्लवी भी है नीलेश की देखरेख को. आपको क्या ज़रूरत है सबकी फ़िक्र करने की?” स्मिता ने मां को थोथी सांत्वना दी थी. थोथी इसलिए, क्योंकि अपने आश्‍वासनों के प्रति वह स्वयं भी आश्‍वस्त नहीं थी. उसे अपना बचपन और मां-पापा का लाड़-दुलार याद आ रहा था. व़क्त के साथ-साथ रिश्तों के समीकरण इतने उलट-पुलट क्यों जाते हैं? माता-पिता के लिए अपने बच्चों की लापरवाहियों, ग़ैरज़िम्मेदाराना हरकतों को माफ़ या नज़रअंदाज़ करना कितना आसान होता है. नाराज़ या क्रोधित होने की बजाय वे उसमें भी बच्चों की मासूमियत खोज लेते हैं. 


लेकिन बड़े होने पर वे ही बच्चे बुज़ुर्ग माता-पिता की अज्ञानतावश की गई ग़लतियों पर खीझ जाते हैं, ग़ुस्सा करने लगते हैं. हमारी सहनशीलता इतनी कम क्यों हो गई है? यदि बुढ़ापा बचपन का पुनरागमन है, तो बुढ़ापे की नादानियों में हमें मासूमियत नज़र क्यों नहीं आती? जो कुछ उनके लिए इतना सहज, सरल था हमारे लिए इतना मुश्किल क्यों है? बे्रकफास्ट टेबल पर नीलेश ने बताया कि रात के खाने पर उसने अपने कुछ विदेशी क्लाइंट्स को आमंत्रित किया है. उनके लिए सी फूड, मैक्सिकन आदि बाहर से आ जाएगा. “पल्लवी, तुम थोड़ा ड्रिंक्स, क्रॉकरी, सजावट आदि देख लेना. मैं शायद उन लोगों के साथ ही घर पहुंचूं. दीदी, आप भी हमें जॉइन करेंगी न?” “अं... टाइम पर आ गई, तो मिल लूंगी सबसे. थोड़ा-बहुत साथ खा भी लूंगी, पर वैसे मुझे यह सब ज़्यादा पसंद नहीं है. मां, आपके लिए जो बनेगा, मैं तो वही खाऊंगी.” नीलेश पल्लवी को और भी निर्देश देता रहा. नाश्ता समाप्त कर उठने तक पार्टी की समस्त रूपरेखा तैयार हो चुकी थी. स्मिता ने कहा, वह जल्दी लौटने का प्रयास करेगी, ताकि पल्लवी की मदद कर सके. किंतु लौटते-लौटते उसे देर हो गई थी. घर पहुंचकर पता चला कि पल्लवी ख़ुद भी थोड़ी देर पहले ही लौटी है. ऑफिस में कुछ काम आ गया था. “पर तैयारी तो सब हो गई दिखती है?” चकित-सी स्मिता ने सब ओर नज़रें दौड़ाते हुए हैरानी ज़ाहिर की, तो कृतज्ञता से अभिभूत पल्लवी ने रहस्योद्घाटन किया. “यह सब मम्मीजी ने करवाया है. 


मैं तो देर हो जाने के कारण ख़ुद घबराई-सी घर पहुंची थी, पर यहां आकर देखा, तो सब तैयार मिला.” “सब मेरे सामने ही तो तय हुआ था. तुम्हें आते नहीं देखा, तो मैंने सोचा मैं ही करवा लूं, वरना नीलेश आते ही तुम पर सवार हो जाएगा. बचपन से ही थोड़ा अधीर है वह! तुम उसकी बातों का बुरा मत माना करो... हां, कुछ कमी रह गई हो, तो तुम ठीक कर लो.” “कोई कमी नहीं है मम्मीजी. सब एकदम परफेक्ट है! इतना अच्छा तो मैं भी नहीं कर सकती थी.” पल्लवी ने भूरि-भूरि प्रशंसा की, तो मां एकदम बच्चों की तरह उत्साहित हो उठीं. “तुम लोग अब तैयार हो जाओ. नीलेश मेहमानों को लेकर आता ही होगा.” जैसी कि उम्मीद थी, पार्टी बहुत अच्छी रही. सबके कहने पर मां एक बार बैठक में आकर मेहमानों से मिल लीं. बाकी समय वे अंदर ही व्यवस्था देखती रहीं. मेहमानों को विदा कर जब तीनों घर में प्रविष्ट हुए, तो देसी घी के तड़के की सुगंध से घर महक रहा था. “वॉव, लगता है मेरी पसंदीदा तहरी बनी है.” स्मिता सुगंध का आनंद लेती हुई डायनिंग टेबल तक पहुंच गई. उसका अनुमान सही था. गरमागरम तहरी सजाए मां उसी का इंतज़ार कर रही थीं. “तुमने तो खा लिया होता मां. तुम क्यों भूखी रहीं? मैंने तो मेहमानों के संग थोड़ा खा लिया था.” कहते हुए स्मिता ने प्लेट में तहरी परोसकर पहला चम्मच मां के मुंह में और दूसरा चम्मच अपने मुंह में रख लिया.


“वाह, कब से इस स्वाद के लिए तरस रही थी. नीलेश, आ चख. तुझे भी तो यह बहुत पसंद है.” स्मिता ने आग्रह किया, तो नीलश ने एक चम्मच भरकर उसी प्लेट से खाना आरंभ कर दिया. एक, दो, तीन... नीलेश को गपागप खाते देख स्मिता चिल्ला पड़ी. “तू अलग ही ले ले भाई.” नीलेश सचमुच अलग प्लेट भरकर खाने बैठ गया. “आपने अभी तो भरपेट खाना खाया था.” पल्लवी के मुंह से बेसाख़्ता निकल गया. “लो, तुम भी टेस्ट करो. इसके लिए तो मैं बचपन में भी पेट में अलग जगह रखता था.” नीलेश को स्पीड से खाता देख पल्लवी के मन का डर ज़ुबां पर आ गया. “आप लोगों को कम न पड़ जाए. और कुछ बना दूं?” “अरे, तू अपने लिए परोस ना. मैंने बहुत सारी बनाई है. कम होगी, तो मैं बना दूंगी.” मां ने पल्लवी को जबरन साथ खाने बैठा लिया. “मां, याद है बचपन में एक बार नीलेश सारी तहरी चट कर गया था. तुम दोबारा बनाने उठीं, तो वह तुम्हारी मदद के लिए रसोई में आ गया था और फिर जल्दबाज़ी में दाल-चावल के डिब्बे ही उलट डाले थे.” “यह नटखट तो हमेशा ऐसे ही काम बढ़ाता था. 


मेरा किशन कन्हैया!” मां ने लाड़ से बेटे को देखा. “जाले उतारने में मदद करने आता, तो एकाध बल्ब या ट्यूबलाइट फूटना तय था. एक बार तो टीवी स्क्रीन ही तोड़ डाली थी.” मां ख़ूब रस ले-लेकर बता रही थीं. “क्या? फिर तो ख़ूब मार पड़ी होगी इन्हें?” पल्लवी बोल पड़ी. “नहीं. मारता तो कोई भी नहीं था. पापा ने डांटा अवश्य था और मां ने तो हमेशा की तरह प्यार से समझा भर दिया था.” कहने के बाद अपने ही शब्दों पर ग़ौर करता नीलेश कुछ सोचने लगा था. “एक बार तो इसने मां की महंगी सिल्क साड़ी पानी में डुबोकर सत्यानाश कर डाली थी.” स्मिता ने याद दिलाया. “दरअसल, पार्टी में मैं इसे गोद में बिठाकर खाना खिला रही थी. इससे मेरी साड़ी पर कुछ गिर गया. घर लौटकर मैंने साड़ी उतारकर ड्राइक्लीन के लिए रख दी. इसने चुपके से उसे पानी में भिगो दिया. पूरी साड़ी ही गई. 


बेचारा मासूम नेकी करना चाहता और नुक़सान हो जाता.” “काहे का मासूम! बदमाश था.” स्मिता बोली. “तू बड़ी दूध की धुली थी! रोज़ रसोई में रोटी बनाने के लिए खिलौने के चौका-बेलन लेकर आ जाती और मेरा दिमाग़ खाती.” मां ने याद दिलाया. “और क्या? एक बोरी आटा, तो बिगाड़ा ही होगा इसने!” नीलेश कहां चूकनेवाला था. “किसी ने कुछ नहीं बिगाड़ा. उन छोटे-छोटे शरारती पलों ने तो रिश्तों को जोड़ने का काम किया. अपनत्व जगाकर प्यार के तंतुओं को जोड़े रखा. समय की आड़ में जब रिश्तों के महल ढहने लगते हैं, तब अपनत्वभरे उन पलों की स्मृति ही हमारा संबल बन जाती है.” भावनाओं में बहती मां उन पलों को याद कर एकाएक बहुत प्रसन्न और संतुष्ट नज़र आने लगी थीं. 


दो दिनों के अल्प प्रवास में स्मिता के लिए ये सबसे यादगार सुकूनमय पल थे और सबसे भव्य दावत भी. अपने शहर लौटकर, तो वह फिर आपाधापीभरी ज़िंदगी में व्यस्त हो गई थी. नीलेश का नाराज़गी भरा फोन आया, तो वह चौंकी, “आपको कुछ वीडियोज़ भेजे थे. तब से आपके कमेंट का इंतज़ार कर रहा हूं.” “ओह, देखती हूं.” स्मिता ने वीडियो देखने आरंभ किए, तो देखती ही रह गई. मॉल में हिचकिचाती मां को हाथ पकड़कर एस्केलेटर चढ़ाते नीलेश और पल्लवी, मां का विस्फारित नेत्रों से चारों ओर ताकना उसे अंदर तक गुदगुदा गया... यह मेरा धूप में सूखता स्मार्टफोन! चिकनाई हटाने के लिए मां ने डिटर्जेंट से धोकर सुखा दिया था... और यह उदास मां! चार दिनों से अनजाने में हुए इस नुक़सान का मातम मना रही हैं. मैं और पल्लवी समझा-समझाकर थक गए. ‘ओह! बेचारी भोली मां.’ स्मिता बुदबुदा उठी. एक अन्य वीडियो में मां बेहद डरते हुए फुट मसाजर पर पांव रखे हुए थी


नीलेश और पल्लवी ने एक-एक पांव जबरन पकड़ रखा था. थोड़ी देर में वे रिलैक्स होती नज़र आईं, तो स्मिता के होंठों पर मुस्कुराहट और आंखों में नमी तैर गई. उसके लिए समय थम-सा गया था. इससे पूर्व कि उसका अधीर भाई उसे दोबारा कमेंट के लिए कॉल करे, स्मिता की उंगलियां मोबाइल पर थिरकने लगी थीं. ‘क्यूटनेस ओवरलोडेड...’ इतने क्यूट कमेंट ने नीलेश की आंखें नम कर दी थीं.-संगीता

Wednesday, February 12, 2025

आत्मविश्वास



 शहर के मशहूर लोहार के पास एक नौजवान आया और बोला मुझे ऐसी तलवार बना दो जो सबसे अलग हो मुझे बादशाह की फौज में जंग में जाना है, मैं कुछ कमाल करना चाहता हूँ, लोहार ने कहा ऐसी तलवार बनाने में समय लगता है, आप एक साल इंतजार करेंगे...?

नौजवान तैयार हो गया, लोहार ने उससे कहा अब आप एक साल फ्री है तो ऐसा करो कि तलवार चलाने की कला तलवार के गुरू से सीखो, आपकी ये तलवार बहुत खास होगी, इसलिए किसी माहिर गुरु का छात्र होना ज़रूरी है, नौजवान ने प्रशिक्षण शुरू कर दिया, एक साल बाद वो लोहार के पास आया और उससे अपनी तलवार ले ली, जंग में गया, खूब तारीफ और नाम कमाया,
जब नौजवान जंग से लौटकर लोहार का शुक्रिया अदा करने आया तो लोहार ने कहा शुक्रिया उस उस्ताद का अदा करो जिससे तुमने तलवारबाज़ी की कला सीखी, तुम्हारी ये तलवार आम तलवार थी जो दो दिन में बन गई, यह आपकी कला है जो एक साधारण चीज़ को ख़ास बनाती है, प्रशिक्षण वह जादू है जो किसी भी कार्य के परिणाम को इतना विशेष बनाता है कि देखने वालों को लगता है कि यह जादू है, क्योंकि प्रशिक्षण आत्मविश्वास देता है,
आत्मविश्वास भी एक जादू है, ये जादू आपसे कुछ भी करवा सकता है, अगर आपको इसका मंतर मालुम हो,

Thursday, June 10, 2021

दशावतार

एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत पाकर अपने विदेश में रहने वाले बेटे से विडियो चैट करते वक्त पूछ बैठी-

"बेटा! कुछ पूजा-पाठ भी करते हो या नहीं?"

बेटा बोला-

"माँ, मैं एक जीव वैज्ञानिक हूँ। मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम कर रहा हूँ। विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन.. क्या आपने उसके बारे में सुना भी है?"

उसकी माँ मुस्कुराई
और बोली.....
"मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ बेटा.. उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के लिए बहुत पुरानी खबर है।"

“हो सकता है माँ!” बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा।

“यदि तुम कुछ समझदार हो, तो इसे सुनो..” उसकी माँ ने प्रतिकार किया।
“क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है?
विष्णु के दस अवतार ?”
बेटे ने सहमति में कहा...
"हाँ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना?"

माँ फिर बोली-
"लेना-देना है..
मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन क्या नहीं जानते हो ?"

“पहला अवतार था 'मत्स्य', यानि मछली। ऐसा इसलिए कि
जीवन पानी में आरम्भ हुआ। यह बात सही है या नहीं?”

बेटा अब ध्यानपूर्वक सुनने लगा..

“उसके बाद आया दूसरा अवतार 'कूर्म', अर्थात् कछुआ
क्योंकि 
जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया.. 'उभयचर (Amphibian)',
तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर के विकास को दर्शाया।”

“तीसरा था 'वराह' अवतार, यानी सूअर। जिसका मतलब वे जंगली जानवर, जिनमें अधिक बुद्धि नहीं होती है। तुम उन्हें डायनासोर कहते हो।”
बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई..

“चौथा अवतार था 'नृसिंह', आधा मानव, आधा पशु। जिसने दर्शाया जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों का विकास।”

“पांचवें 'वामन' हुए, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था।
क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है? क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे- होमो इरेक्टस(नरवानर) और होमो सेपिअंस (मानव), और
होमो सेपिअंस ने विकास की लड़ाई जीत ली।”

बेटा दशावतार की प्रासंगिकता सुन के स्तब्ध रह गया..

माँ ने बोलना जारी रखा-
“छठा अवतार था 'परशुराम', जिनके पास शस्त्र (कुल्हाड़ी) की ताकत थी। वे दर्शाते हैं उस मानव को, जो गुफा और वन में रहा.. गुस्सैल और असामाजिक।”

“सातवां अवतार थे 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम', सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति। जिन्होंने समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार।”

“आठवां अवतार थे 'भगवान श्री कृष्ण', राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी। जिन्होंने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक ढांचे में रहकर कैसे फला-फूला जा सकता है?”
बेटा सुनता रहा, चकित और विस्मित..

माँ ने ज्ञान की गंगा प्रवाहित रखी -
“नवां * थे 'महात्मा बुद्ध', वे व्यक्ति जिन्होंने नृसिंह से उठे मानव के सही स्वभाव को खोजा। उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की।”

“..और अंत में दसवां अवतार 'कल्कि' आएगा। वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो.. वह मानव, जो आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठतम होगा।”

बेटा अपनी माँ को अवाक् होकर देखता रह गया..

अंत में वह बोल पड़ा-
“यह अद्भुत है माँ.. हिंदू दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है!”

मित्रों..
वेद, पुराण, ग्रंथ, उपनिषद इत्यादि सब अर्थपूर्ण हैं। सिर्फ आपका देखने का नज़रिया होना चाहिए। फिर चाहे वह धार्मिक हो या वैज्ञानिकता.

सफलता सूत्र

सफलता सूत्र
- सीए सुधीर कुमार वार्ष्णेय 
राज एक मजदूर का बेटा था और कस्बे के सरकारी स्कूल में पढ़ता था। सरकारी स्कूल और राज के घर के बीच में एक पब्लिक स्कूल था जिसमे शहर के धनाढ्य लोगों के बच्चे पढ़ने आते थे। राज अपने स्कूल जाते अक्सर उन बच्चों को स्कूल आते देखता था। चमचमाती ड्रेस पहने अपनी गाड़ियों से आते बच्चों को देख कर उसे अपने आप पर और अपने भाग्य पर गुस्सा आता था और उन अमीर बच्चों के भाग्य से ईर्ष्या। राज वैसे तो पढ़ाई में अच्छा था लेकिन उसे लगता था कि सरकारी स्कूल में पढ़ कर आप उतने सफल नहीं हो सकते जितने प्राइवेट स्कूल में पढ़ कर। इसी विचार की वजह से उसका मन पढ़ाई से उचटता जा रहा था। हालात ये हो गए की उसने अपने पिता से उसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की बात कही बरना पढ़ाई न करने की धमकी दी। 
उसके मजदूर पिता ने ऐसा करने में असमर्थता जताई क्योंकि उसके आय के स्रोत बहुत सीमित थे जिसमे वो उसे सरकारी स्कूल में जैसे तैसे पढ़ा सकता था। पिता ने उस से इस जिद की वजह पूछी तो उसने बताने से इंकार कर दिया और अपनी बात पर अड़ा रहा। अपनी बात न मानते देख राज विद्रोह पर उतर आया और उसने स्कूल जाना बंद कर दिया। उसके पिता राज के व्यवहार से और उसकी जिद से परेशान थे। उसके पिता चाहते थे की जब वो बड़ा हो तो पढ़ लिख कर कोई सही सी नौकरी करे और उसकी तरह जिंदगी भर मजदूरी न करे। दो चार दिन उसके पिता ने उसे मनाने की कोशिश की लेकिन राज अपनी जिद पर अड़ा रहा। हारकर उसके पिता ने उसके कक्षाध्यापक से बात कर राज की जिद के बारे बताया और कोई हल निकालने को कहा। कक्षाध्यापक ने उसके घर आकर राज से बात करने का अश्वासन दिया। 
एक दिन कक्षाध्यापक राज के घर पर पहुंचे और उस से स्कूल न आने का कारण जानना चाहा। राज ने बताया कि वो सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ना चाहता। कक्षाध्यापक ने इसका कारण जानना चाहा तो राज ने कहा कि वो पढ़ने में ठीक है और उसे लगता है कि प्राइवेट स्कूल में पढ़ कर उसका भविष्य ज्यादा उज्जवल होगा। कक्षाध्यापक ने उसे समझाया – ‘ऐसा मानना सही नहीं है कि पढ़ने की जगह आपका भविष्य तय करती है। आपका भविष्य आपके दिमाग और उसके ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता एवं ग्रहण किये गए ज्ञान को सही तरह से उपयोग करने पर निर्भर करता है। यह ठीक है कि समाज में प्राइवेट स्कूलों में पढने वाले बच्चों को ज्यादा स्मार्ट माना जाता है लेकिन यह मानना तो सरासर गलत है कि सरकारी स्कूलों के बच्चों में प्रतिभा नहीं होती या वो स्मार्ट नहीं होते। दिमाग के दरवाजे अगर खुले रखो तो ज्ञान कहीं से भी अर्जित किया जा सकता है। क्या एकलव्य ने द्रोणाचार्य के द्वारा धनुर्विद्या देने से मना करने पर अभ्यास करना छोड़ दिया था? ये जो ज्ञान ग्रहण करने की, सीखने की प्यास जगह देख कर नहीं वरन आपके इरादों से पूरी होती है। अगर आप सही स्रोत से, सही तरीके से ज्ञानार्जन करेंगे और उपार्जित ज्ञान को सही तरीके से उपयोग करना सीखा जायेंगे तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम गरीब हो या अमीर अथवा तुम सरकारी स्कूल में पढ़ते हो या प्राइवेट स्कूल में। तुम्हारे पिता एक मजदूर है लेकिन वो नहीं चाहते की तुम भी उनके तरह मजदूर बनो। वो तुम्हे आगे बढ़ता हुआ देखना चाहते है और तुम अपनी जिद में अपना भविष्य बर्बाद करने पर तुले हो जो कतई सही नहीं है। आशा है तुम्हे मेरी बातें समझ आ गयी होंगी। अगर हाँ तो कल से नियमित स्कूल आना शुरू करो और अपना पूरा दिमाग पढ़ाई में लगाओ जिस से तुम्हारा भविष्य उज्जवल हो सके।' राज ने सहमति में अपना सर हिलाया तो कक्षाध्यापक ने उसके सर पर हाथ रखा और विदा ली।
फेज - 2, श्री अक्रूर जी पुरम, रामबाग रोड, चंदौसी - 244412 जिला संभल (उत्तर प्रदेश)

Tuesday, May 18, 2021

*💐💐अनपढ़ डॉक्टर💐💐*

*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
          
*💐💐अनपढ़ डॉक्टर💐💐*
केपटाउन के अशिक्षित व्यक्ति सर्जन श्री हैमिल्टन नकी, जो एक भी अंग्रेज़ी शब्द नहीं पढ़ सकते थे और ना ही लिख सकते थे, जिन्होंने अपने जीवन में कभी स्कूल का चेहरा नहीं देखा था... उन्हें मास्टर ऑफ मेडिसीन की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया ।
आइए देखे कि यह कैसे संभव है ...
केपटाउन मेडिकल यूनिवर्सिटी जगत् में अग्रणी स्थान पर है । दुनिया का पहला बाइपास ऑपरेशन इसी विश्वविद्यालय में हुआ । सन् 2003 में, एक सुबह, विश्व प्रसिद्ध सर्जन प्रोफेसर डेविड डेंट ने विश्वविद्यालय के सभागार में घोषणा की: "आज हम उस व्यक्ति को चिकित्सा क्षेत्र में मानद उपाधि प्रदान कर रहे हैं, जिसने सबसे अधिक सर्जरी की हैं ।
इस घोषणा के साथ प्रोफेसर ने "हैमिल्टन" का गौरव किया और पूरा सभागार खड़ा हो गया । हैमिल्टन ने सभी को अभिवादन किया ...
यह इस विश्वविद्यालय के इतिहास का सबसे बड़ा स्वागत समारोह था ।
हैमिल्टन का जन्म केपटाउन के एक सुदूर गाँव सैनिटानी में हुआ था । उनके माता-पिता चरवाहे थे, वे बचपन में बकरी की खाल पहनते और पूरे दिन नंगे पांव पहाड़ों में घूमते रहते उनके पिताजी बीमार पड़ने के कारण हैमिल्टन केपटाउन पहुँचे । वही विश्वविद्यालय का निर्माण कार्य चला था । वे एक मज़दूर के रूप में विश्वविद्यालय से जुड़े । कई वर्षो तक उन्होंने वहाँ काम किया । दिन भर के काम के बाद जितना पैसा मिलता, वह घर भेज देते थे और खुद सिकुड़ कर खुले मैदान में सो जाते थे । उसके बाद उन्हें टेनिस कोर्ट के ग्राउंड्स मेंटेनेंस वर्कर के रुप में रखा गया । यह काम करते हुए तीन साल बीते ।
फिर उनके जीवन में एक अजीब मोड़ आया और वह चिकित्सा विज्ञान में एक ऐसे बिंदु पर पहुँच गए, जहाँ कोई और कभी नहीं पहुँच पाया था ।

यह एक सुनहरी सुबह थी । "प्रोफेसर रॉबर्ट जॉयस, जिराफों पर शोध करना चाहते थे: उन्होंने ऑपरेटिंग टेबल पर एक जिराफ रखा, उसे बेहोश कर दिया, लेकिन जैसे ही ऑपरेशन शुरू हुआ, जिराफ ने अपना सिर हिला दिया। उन्हें जिराफ की गर्दन को मजबूती से पकड़े रखने के लिए एक हट्टे कट्टे आदमी की जरूरत थी । प्रोफेसर थिएटर से बाहर आए, 'हैमिल्टन' लॉन में काम कर रहे थे, प्रोफेसर ने देखा कि वह मज़बूत कद काठी का स्वस्थ युवक है । उन्होंने उसे बुलाया और उसे जिराफ़ को पकड़ने का आदेश दिया ।
ऑपरेशन आठ घंटे तक चला । ऑपरेशन के दौरान, डॉक्टर चाय और कॉफ़ी ब्रेक लेते रहे, हालांकि "हैमिल्टन" वे जिराफ़ की गर्दन पकड़कर खड़े रहे । जब ऑपरेशन खत्म हो गया, तो हैमिल्टन चुपचाप चले गए । 

अगले दिन प्रोफेसर ने हैमिल्टन को फिर से बुलाया, वह आया और जिराफ की गर्दन पकड़कर खड़ा हो गया, इसके बाद यह उसकी दिनचर्या बन गई । हैमिल्टन ने कई महीनों तक दुगना काम किया, और उसने न अधिक पैसे माँगे, ना ही कभी कोई शिकायत की । प्रोफेसर रॉबर्ट जॉयस उनकी दृढ़ता और ईमानदारी से प्रभावित हुए और हैमिल्टन को टेनिस कोर्ट से 'लैब असिस्टेंट' के रूप में पदोन्नत किया गया । अब वह विश्वविद्यालय के ऑपरेटिंग थियेटर में सर्जनों की मदद करने लगे । यह प्रक्रिया सालों तक चलती रही ।

1958 में उनके जीवन में एक और मोड़ आया । इस वर्ष डॉ. बर्नार्ड ने विश्वविद्यालय में आकर हृदय प्रत्यारोपण ऑपरेशन शुरू किया । हैमिल्टन उनके सहायक बन गए, इन ऑपरेशनों के दौरान, वे सहायक से अतिरिक्त सर्जन पद पर कार्यरत थे ।
अब डॉक्टर ऑपरेशन करते और ऑपरेशन के बाद हैमिल्टन को सिलाई का काम दिया जाता था । वह बेहतरीन टाँके लगाते। उनकी उंगलियाँ साफ और तेज थीं । वे एक दिन में पचास लोगों को टाँके लगाते थे । ऑपरेटिंग थियेटर में काम करने के दौरान, वे मानव शरीर को सर्जनों से अधिक समझने लगे इसलिए वरिष्ठ डॉक्टरों ने उन्हें अध्यापन की जिम्मेदारी सौंपी ।
उन्होंने अब जूनियर डॉक्टरों को सर्जरी तकनीक सिखाना शुरू किया । वह धीरे-धीरे विश्वविद्यालय में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए । वह चिकित्सा विज्ञान की शर्तों से अपरिचित थे लेकिन वह सबसे कुशल सर्जन साबित हुए ।

उनके जीवन में तीसरा मोड़ सन् 1970 में आया, जब इस साल लीवर पर शोध शुरू हुआ और उन्होंने सर्जरी के दौरान लीवर की एक ऐसी धमनी की पहचान की, जिससे लीवर प्रत्यारोपण आसान हुआ । उनकी टिप्पणियों ने चिकित्सा विज्ञान के महान दिमागों को चकित कर दिया।
आज, जब दुनिया के किसी कोने में किसी व्यक्ति का लीवर ऑपरेशन होता है और मरीज अपनी आँखें खोलता है, नई उम्मीद से फिर से जी उठता है तब इस सफल ऑपरेशन का श्रेय सीधे "हैमिल्टन" को जाता है ।
हैमिल्टन ने ईमानदारी और दृढ़ता के साथ यह मुकाम हासिल किया । वे केपटाउन विश्वविद्यालय से 50 वर्षों तक जुड़े रहे । उन 50 वर्षों में उन्होंने कभी छुट्टी नहीं ली।

वे रात को तीन बजे घर से निकलते थे, 14 मील पैदल चलकर विश्वविद्यालय जाते थे, और वह ठीक छः बजे ऑपरेशन थिएटर में प्रवेश करते थे । लोग उनके समय के साथ अपनी घड़ियों को ठीक करते थे ।
उन्हें यह सम्मान मिला जो चिकित्सा विज्ञान में किसी को भी नहीं मिला है।

वे चिकित्सा इतिहास के पहले अनपढ़ शिक्षक थे । वे अपने जीवनकाल में 30,000 सर्जनों को प्रशिक्षित करनेवाले पहले निरक्षर सर्जन थे ।
2005 में उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें विश्वविद्यालय में दफनाया गया । इसके बाद सर्जनों को विश्वविद्यालय ने अनिवार्य कर दिया गया कि वे डिग्री हासिल करने के बाद उनकी कब्र पर जाएँ, एक तस्वीर खिंचे और फिर अपने सेवा कार्य में जुटे ।
"आपको पता है कि उन्हें यह पद कैसे मिला ?”
"केवल एक 'हाँ'।"

जिस दिन उन्हें जिराफ की गर्दन पकड़ने के लिए ऑपरेटिंग थियेटर में बुलाया गया, अगर उन्होंने उस दिन मना कर दिया होता, अगर उस दिन उन्होंने कहा होता,' मैं ग्राउंड्स मेंटेनेंस वर्कर हूँ, मेरा काम जिराफ की गर्दन पकड़ना नहीं है तब…' सोचिए! केवल एक ''हाँ ।" और अतिरिक्त आठ घंटे की कड़ी मेहनत थी, जिसने उनके लिए सफलता के द्वार खोल दिए और वह सर्जन बन गए ।
 
"हम में से ज्यादातर लोग अपने जीवनभर नौकरी की तलाश में रहते हैं जबकि हमें काम ढूंढना होता है । ” दुनिया में हर काम का एक मानदंड होता है और नौकरी केवल उन लोगों के लिए उपलब्ध होती है जो मानदंडों को पूरा करते हैं जबकि अगर आप काम करना चाहते हैं, तो आप दुनिया में कोई भी काम कुछ ही मिनटों में शुरू कर सकते हैं और कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकेगी । 
 
हैमिल्टन ने रहस्य पाया था, उन्होंने नौकरी के बजाय काम करते रहने को महत्व दिया । इस प्रकार उन्होंने चिकित्सा-विज्ञान के इतिहास को बदल दिया । सोचिए अगर वे सर्जन की नौकरी के लिए आवेदन करते तो क्या वह सर्जन बन सकते थे ? कभी नहीं, लेकिन उन्होंने जिराफ की गर्दन पकड़ी और सर्जन बन गए ।

*सीख-बेरोज़गार लोग असफल होते हैं क्योंकि वे सिर्फ नौकरी की तलाश करते हैं, काम की नहीं । जिस दिन आपने "हैमिल्टन" की तरह काम करना शुरू किया, आप सफल एवं महान मानव बन जाएँगे ।

*सदैव प्रसन्न रहिये।
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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