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Sunday, September 14, 2025

सिंह और गाय

 


एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया।घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए। 

दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढ़ते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।गाय समर्पित हृदय का प्रतीक है।बाघ अहंकारी मन है।मालिक सद्गुरु का प्रतीक है।कीचड़ यह संसार है।और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

ॐ श्री गुरुवे नमः

Monday, October 1, 2018

*प्रभु की गोद*

*प्रभु की गोद*
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एक व्यक्ति बहुत नास्तिक था... उसको भगवान पर विश्वास नहीं था...
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एक बार उसके साथ दुर्घटना घटित हुई.. वो रोड पर पड़ा पड़ा सब की ओर कातर निगाहों से मदद के लिए देख रहा था,
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पर कलियुग का इंसान - किसी इंसान की मदद जल्दी नहीं करता,
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मालूम नहीं क्यों, वो यही सोच कर थक गया... तभी उसके नास्तिक मन ने अनमने से प्रभु को गुहार लगाई...
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उसी समय एक ठेलेवाला वहां से गुजरा उसने उसको गोद में उठाया और चिकित्सा हेतु ले गया
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उसने उनके परिवार वालो को फ़ोन किया और अस्पताल बुलाया
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सभी आये उस व्यक्ति को बहुत धन्यवाद दिया... उसके घर का पता भी लिखवा लिया
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जब यह ठीक हो जायेगा तो आप से मिलने आयेंगे -
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वो सज्जन सही हो गए... कुछ दिन बाद वो अपने परिवार के साथ उस व्यक्ति से मिलने का इरादा बनाते है और निकल पड़ते है मिलने |
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वो बाँके बिहारी का नाम पूछते हुए उस पते पर जाते है
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उनको वहा पर प्रभु का मंदिर मिलता है, वो अचंभित से उस भवन को देखते है, और उसके अन्दर चले जाते जाते है |
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अभी भी वहा पर पुजारी से नाम लेकर पूछते है की यह बाँके बिहारी कहा मिलेगा -
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पुजारी हाथ जोड़ मूर्ति की ओर इशारा कर के कहता है की यहाँ यही एक बाँके बिहारी है |
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खैर वो मंदिर से लौटने लगते है तो उनकी निगाह एक बोर्ड पर पड़ती है उसमे एक वाक्य लिखा दिखता है - कि
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*इंसान ही इंसान के काम आता है, उस से प्रेम करते रहो मै तो तुम्हे स्वयं मिल जाऊंगा...*🙏🏼
Source- facebook

Tuesday, September 25, 2018

जय श्री कृष्ण

"जय श्री कृष्ण "एक प्रसिद्ध नगर मे भगवान श्री कृष्ण का मंदिर था वही पास मे एक बहुत बडा बाजार भी था मंदिर मे भगवान को मक्खन मिश्री का ही भोग लगता था उसी बाजार मे एक जलेबी वाले ने दुकान खोली ओर सबसे पहले वो जलेबिया बनाकर भगवान को भोग लगाने के लिए ले गया मगर पुजारी ने ये कहकर मना कर दिया कि भगवान को सिर्फ मक्खन मिश्री का ही भोग लगाया जाता हे दुखी मन से जलेबी वाला बाहर आकर गरीबों मे सारी जलेबिया बांट देता हे भगवान श्री कृष्ण भी बालक रूप धारण करके जलेबी लेकर खाते हे उन्हें जलेबी बहुत अच्छी लगती हे शाम को मदिर के कपाट बंद हो जाने के बाद भगवान बालक रुप धारण करके बाजार मे जलेबी वाले के पास पहुंच जाते हे औऱ जलेबी मांगते हे जलेबी वाला पूछता हे कितने पैसों की दू तो बालक श्री कृष्ण कहते हे मेरे पास तो पैसे नही हे जलेबी वाला कहता है तो जलेबी नही मिलेगी इस पर बालक श्री कृष्ण अपने हाथ का कंगन जोकि सोने का होता हे कहकर कि जलेबी तो मे जरूर खाऊगा ये रख लो जलेबी वाला सोने के कंगन को देखकर बोला पर इस बदले कितनी जलेबी दू बालक श्री कृष्ण बोले ये थाली भर दे दो जलेबी वाले ने पूरा थाल भर कर जलेबी दे दी बालक श्री कृष्ण बोले मे ये जलेबी वहाँ बैठकर खालू जलेबी वाला बोला जाओ खालो इसके बाद जलेबी वाला जलेबी बानाने मे बिजी हो गया और बालक वहाँ से आलोप हो गया अगले दिन जब सुबह पुजारी मंदिर मे भगवान की पुजा के लिए आऐ तो देखा कि भगवान के हाथ का कंगन गायब हे मंदिर के सभी लोग भगवान के कंंगन को ढूढने मे लग गये कंगन तो मिला नही जलेबी वाले कि थाली मिल गई जिस पर उसका नाम लिखा था पुजारी अपने सभी साथियों सहित जलेबी वाले के पास पहुंचे ओर उससे पूछा कि तुमहारा थाल मंदिर मे कैसा आया जलेबी वाले ने उन्हें सारी बात बता दी औऱ वो कंगन भी दिखाया जो बालक बने श्री कृष्ण ने उन्हें दिया था पुजारी ने अपने दोनों हाथ ऊपर करके कहा भगवान मैंने आपकी इतनी सेवा की मगर आपके दर्शन नही हूऐ ओर आप ने इस जलेबी वाले को अपने बालक रूपी दर्शन करा दिऐ तभी वहाँ आकाश वाणी हुई भगवान बोले मे हे पुजारी ...मे तो सिर्फ श्रद्धा भाव का भूखा हू मे तो अपने भक्तों के बस मे हू तुम ने इस जलेबी वाले का मन ये कहकर दुखाया कि मे सिर्फ मकखन मिश्री खाता हूं जबकि मे तो अपने भक्त के प्यार का भूखा हूं..कहकर आवाज लुप्त हो गई मित्रों सचमुच प्रभु प्यार और भाव के भूखे होते है और हम सभी उन्हें दिखावे के जरिये रिझाने की कोशिश मे रहते है अपने प्रभु से मन से श्रद्धा भाव से प्रेम कीजिए उन्हें पाने का एक यही उपाय है
जय श्री कृष्ण

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