Tuesday, May 18, 2021

*💐💐अनपढ़ डॉक्टर💐💐*

*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
          
*💐💐अनपढ़ डॉक्टर💐💐*
केपटाउन के अशिक्षित व्यक्ति सर्जन श्री हैमिल्टन नकी, जो एक भी अंग्रेज़ी शब्द नहीं पढ़ सकते थे और ना ही लिख सकते थे, जिन्होंने अपने जीवन में कभी स्कूल का चेहरा नहीं देखा था... उन्हें मास्टर ऑफ मेडिसीन की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया ।
आइए देखे कि यह कैसे संभव है ...
केपटाउन मेडिकल यूनिवर्सिटी जगत् में अग्रणी स्थान पर है । दुनिया का पहला बाइपास ऑपरेशन इसी विश्वविद्यालय में हुआ । सन् 2003 में, एक सुबह, विश्व प्रसिद्ध सर्जन प्रोफेसर डेविड डेंट ने विश्वविद्यालय के सभागार में घोषणा की: "आज हम उस व्यक्ति को चिकित्सा क्षेत्र में मानद उपाधि प्रदान कर रहे हैं, जिसने सबसे अधिक सर्जरी की हैं ।
इस घोषणा के साथ प्रोफेसर ने "हैमिल्टन" का गौरव किया और पूरा सभागार खड़ा हो गया । हैमिल्टन ने सभी को अभिवादन किया ...
यह इस विश्वविद्यालय के इतिहास का सबसे बड़ा स्वागत समारोह था ।
हैमिल्टन का जन्म केपटाउन के एक सुदूर गाँव सैनिटानी में हुआ था । उनके माता-पिता चरवाहे थे, वे बचपन में बकरी की खाल पहनते और पूरे दिन नंगे पांव पहाड़ों में घूमते रहते उनके पिताजी बीमार पड़ने के कारण हैमिल्टन केपटाउन पहुँचे । वही विश्वविद्यालय का निर्माण कार्य चला था । वे एक मज़दूर के रूप में विश्वविद्यालय से जुड़े । कई वर्षो तक उन्होंने वहाँ काम किया । दिन भर के काम के बाद जितना पैसा मिलता, वह घर भेज देते थे और खुद सिकुड़ कर खुले मैदान में सो जाते थे । उसके बाद उन्हें टेनिस कोर्ट के ग्राउंड्स मेंटेनेंस वर्कर के रुप में रखा गया । यह काम करते हुए तीन साल बीते ।
फिर उनके जीवन में एक अजीब मोड़ आया और वह चिकित्सा विज्ञान में एक ऐसे बिंदु पर पहुँच गए, जहाँ कोई और कभी नहीं पहुँच पाया था ।

यह एक सुनहरी सुबह थी । "प्रोफेसर रॉबर्ट जॉयस, जिराफों पर शोध करना चाहते थे: उन्होंने ऑपरेटिंग टेबल पर एक जिराफ रखा, उसे बेहोश कर दिया, लेकिन जैसे ही ऑपरेशन शुरू हुआ, जिराफ ने अपना सिर हिला दिया। उन्हें जिराफ की गर्दन को मजबूती से पकड़े रखने के लिए एक हट्टे कट्टे आदमी की जरूरत थी । प्रोफेसर थिएटर से बाहर आए, 'हैमिल्टन' लॉन में काम कर रहे थे, प्रोफेसर ने देखा कि वह मज़बूत कद काठी का स्वस्थ युवक है । उन्होंने उसे बुलाया और उसे जिराफ़ को पकड़ने का आदेश दिया ।
ऑपरेशन आठ घंटे तक चला । ऑपरेशन के दौरान, डॉक्टर चाय और कॉफ़ी ब्रेक लेते रहे, हालांकि "हैमिल्टन" वे जिराफ़ की गर्दन पकड़कर खड़े रहे । जब ऑपरेशन खत्म हो गया, तो हैमिल्टन चुपचाप चले गए । 

अगले दिन प्रोफेसर ने हैमिल्टन को फिर से बुलाया, वह आया और जिराफ की गर्दन पकड़कर खड़ा हो गया, इसके बाद यह उसकी दिनचर्या बन गई । हैमिल्टन ने कई महीनों तक दुगना काम किया, और उसने न अधिक पैसे माँगे, ना ही कभी कोई शिकायत की । प्रोफेसर रॉबर्ट जॉयस उनकी दृढ़ता और ईमानदारी से प्रभावित हुए और हैमिल्टन को टेनिस कोर्ट से 'लैब असिस्टेंट' के रूप में पदोन्नत किया गया । अब वह विश्वविद्यालय के ऑपरेटिंग थियेटर में सर्जनों की मदद करने लगे । यह प्रक्रिया सालों तक चलती रही ।

1958 में उनके जीवन में एक और मोड़ आया । इस वर्ष डॉ. बर्नार्ड ने विश्वविद्यालय में आकर हृदय प्रत्यारोपण ऑपरेशन शुरू किया । हैमिल्टन उनके सहायक बन गए, इन ऑपरेशनों के दौरान, वे सहायक से अतिरिक्त सर्जन पद पर कार्यरत थे ।
अब डॉक्टर ऑपरेशन करते और ऑपरेशन के बाद हैमिल्टन को सिलाई का काम दिया जाता था । वह बेहतरीन टाँके लगाते। उनकी उंगलियाँ साफ और तेज थीं । वे एक दिन में पचास लोगों को टाँके लगाते थे । ऑपरेटिंग थियेटर में काम करने के दौरान, वे मानव शरीर को सर्जनों से अधिक समझने लगे इसलिए वरिष्ठ डॉक्टरों ने उन्हें अध्यापन की जिम्मेदारी सौंपी ।
उन्होंने अब जूनियर डॉक्टरों को सर्जरी तकनीक सिखाना शुरू किया । वह धीरे-धीरे विश्वविद्यालय में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए । वह चिकित्सा विज्ञान की शर्तों से अपरिचित थे लेकिन वह सबसे कुशल सर्जन साबित हुए ।

उनके जीवन में तीसरा मोड़ सन् 1970 में आया, जब इस साल लीवर पर शोध शुरू हुआ और उन्होंने सर्जरी के दौरान लीवर की एक ऐसी धमनी की पहचान की, जिससे लीवर प्रत्यारोपण आसान हुआ । उनकी टिप्पणियों ने चिकित्सा विज्ञान के महान दिमागों को चकित कर दिया।
आज, जब दुनिया के किसी कोने में किसी व्यक्ति का लीवर ऑपरेशन होता है और मरीज अपनी आँखें खोलता है, नई उम्मीद से फिर से जी उठता है तब इस सफल ऑपरेशन का श्रेय सीधे "हैमिल्टन" को जाता है ।
हैमिल्टन ने ईमानदारी और दृढ़ता के साथ यह मुकाम हासिल किया । वे केपटाउन विश्वविद्यालय से 50 वर्षों तक जुड़े रहे । उन 50 वर्षों में उन्होंने कभी छुट्टी नहीं ली।

वे रात को तीन बजे घर से निकलते थे, 14 मील पैदल चलकर विश्वविद्यालय जाते थे, और वह ठीक छः बजे ऑपरेशन थिएटर में प्रवेश करते थे । लोग उनके समय के साथ अपनी घड़ियों को ठीक करते थे ।
उन्हें यह सम्मान मिला जो चिकित्सा विज्ञान में किसी को भी नहीं मिला है।

वे चिकित्सा इतिहास के पहले अनपढ़ शिक्षक थे । वे अपने जीवनकाल में 30,000 सर्जनों को प्रशिक्षित करनेवाले पहले निरक्षर सर्जन थे ।
2005 में उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें विश्वविद्यालय में दफनाया गया । इसके बाद सर्जनों को विश्वविद्यालय ने अनिवार्य कर दिया गया कि वे डिग्री हासिल करने के बाद उनकी कब्र पर जाएँ, एक तस्वीर खिंचे और फिर अपने सेवा कार्य में जुटे ।
"आपको पता है कि उन्हें यह पद कैसे मिला ?”
"केवल एक 'हाँ'।"

जिस दिन उन्हें जिराफ की गर्दन पकड़ने के लिए ऑपरेटिंग थियेटर में बुलाया गया, अगर उन्होंने उस दिन मना कर दिया होता, अगर उस दिन उन्होंने कहा होता,' मैं ग्राउंड्स मेंटेनेंस वर्कर हूँ, मेरा काम जिराफ की गर्दन पकड़ना नहीं है तब…' सोचिए! केवल एक ''हाँ ।" और अतिरिक्त आठ घंटे की कड़ी मेहनत थी, जिसने उनके लिए सफलता के द्वार खोल दिए और वह सर्जन बन गए ।
 
"हम में से ज्यादातर लोग अपने जीवनभर नौकरी की तलाश में रहते हैं जबकि हमें काम ढूंढना होता है । ” दुनिया में हर काम का एक मानदंड होता है और नौकरी केवल उन लोगों के लिए उपलब्ध होती है जो मानदंडों को पूरा करते हैं जबकि अगर आप काम करना चाहते हैं, तो आप दुनिया में कोई भी काम कुछ ही मिनटों में शुरू कर सकते हैं और कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकेगी । 
 
हैमिल्टन ने रहस्य पाया था, उन्होंने नौकरी के बजाय काम करते रहने को महत्व दिया । इस प्रकार उन्होंने चिकित्सा-विज्ञान के इतिहास को बदल दिया । सोचिए अगर वे सर्जन की नौकरी के लिए आवेदन करते तो क्या वह सर्जन बन सकते थे ? कभी नहीं, लेकिन उन्होंने जिराफ की गर्दन पकड़ी और सर्जन बन गए ।

*सीख-बेरोज़गार लोग असफल होते हैं क्योंकि वे सिर्फ नौकरी की तलाश करते हैं, काम की नहीं । जिस दिन आपने "हैमिल्टन" की तरह काम करना शुरू किया, आप सफल एवं महान मानव बन जाएँगे ।

*सदैव प्रसन्न रहिये।
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

Monday, September 28, 2020

बहु का पत्र


बहु का पत्र

आदरणीय मम्मी जी,
सादर चरण स्पर्श!
आशा है, आप सकुशल होंगी. आप हैरान भी हो रही होंगी कि कम्प्यूटर, मोबाइल के इस युग में आपकी तथाकथित आधुनिक बहू को पत्र लिखने की ज़रूरत कैसे पड़ गई? कहावत है न कि व्यक्ति अनुभव से ही सब कुछ सीखता है, शायद एकदम सही है. पिछले कुछ समय से जीवन में ऐसी घटनाएं घटी हैं, जिन्होंने मेरी सोच में परिवर्तन कर दिया है. जीवन की गहराई में जाने के बजाय हम उसके उथलेपन में जो नकली चमक के मोती-मणि देखते हैं या पाते हैं, उसी में संतुष्ट होकर अपना नज़रिया, अपनी राय जीवन के प्रति बना लेते हैं. बाद में हमें पछतावा होता है कि हम तो ठगे गए, मोती तो नकली निकले. ग़लती हमारी ही होती है, सच्चे मोती प्राप्त करने के लिए तो तल तक जाना पड़ता है, जिसकी हम कोशिश ही नहीं करते.
आप सोच रही होंगी, मैं दार्शनिकों की भाषा कैसे बोलने लगी? मैं, जो अपने आपको ज़िंदादिल, आधुनिक, अक्लमंद समझती थी, आज अचानक जीवन को समझने की बातें कैसे करने लगी? मम्मी जी, पिछले कुछ दिनों में जो अनुभव हुए हैं उन्हें फ़ोन पर नहीं बताया जा सकता. कई बार ऐसा होता है, जो बातें हम लिखकर अभिव्यक्त करते हैं, उन्हें बोलकर उतने प्रभावशाली ढंग से व्यक्त नहीं कर सकते. शुरू कहां से करूं? चलिए, सीधे-सीधे आपके पोते “श्लोक” से ही शुरुआत करती हूं. तीन वर्ष पूर्व जब आप यहां से वापस अपने छोटे-से क़स्बेनुमा शहर में गई थी, उस वक़्त श्लोक पांच वर्ष का था. लेकिन उसी हरक़तें व बातें देख-सुनकर हम सभी दंग रह जाते थे. गोरे, गदबदे, सुंदर श्लोक की नज़र उतारते हुए आप कहती थीं,‘इसे भगवान ने बड़ा तेज़ दिमाग़ दिया है. अगर इसे सही मार्गदर्शन मिलता रहा तो यह बहुत बड़ा आदमी बनेगा.’ आपकी बाक़ी बातों से तो सहमत थी, लेकिन ‘इसे सही मार्गदर्शन मिलता रहा...’ वाक्य पर मैं खीझ उठती. क्या मैं और समीर अपने बच्चे का ग़लत मार्गदर्शन करेंगे? अप्रत्यक्ष रूप से मैं अपनी खीझ आप पर निकाल देती थी. आप भी बात को समझ गई थीं तभी तो बाद में एक मूक दर्शक की भूमिका निभाने लगी थीं.
आपके जाने के बाद पिछले तीन सालों में श्लोक के व्यवहार, बोलचाल, स्वभाव आदि में जो बदलाव आए हैं, उनसे मैं और समीर चिंतित हो रहे हैं. आप तो जानती हैं, उसे हमने इस महानगर के सबसे ऊंची साखवाले अंतर्राष्ट्रीय स्तर की शिक्षा देनेवाले स्कूल में दाख़िल किया था. यहां काफ़ी तगड़ी फ़ीस लेकर बच्चों को उच्च स्तरीय शिक्षा देने का दावा किया जाता है. लेकिन बच्चों को धीरे-धीरे विदेशी सभ्यता व संस्कार, रहन-सहन की जो ख़ुराक दी जा रही है, वह हमें दिखाई नहीं दे रहीं. बच्चों के अजीबो-ग़रीब व्यवहार, बातें सुनकर हम कह देते हैं-आज के बच्चे बड़े स्मार्ट, बुद्धिमान हैं, लेकिन श्लोक की बातों, व्यवहार से अपने आप को आधुनिक मानने वाली मैं स्वयं उस दिन स्तब्ध रह गई, जब स्कूल से लौटकर उसने कहा,‘ममा, आज हमारी मैम बड़ी सेक्सी लग रही थी. पिंक साड़ी उसे बहुत सूट करती है. आप भी पिंक साड़ी पहना करो, मैम जैसी सेक्सी दिखोगी...’ कुछ क्षणों की स्तब्धता के बाद मैंने बात संभाली,‘तुम जानते हो सेक्सी का मतलब क्या होता है? ऐसी बातें तुम्हारे स्कूल में कौन करता है?’ वह बड़े भोलेपन से बोला,‘कम ऑन ममा, ये कोई बताने की बात है! टीवी में, कम्प्यूटर में, फ़िल्मों में सब जगह तो देखते हैं, जब कोई लड़की, और बहुत सुंदर दिखती है, उसे कहते हैं-बड़ी सेक्सी लग रही है.’
मैंने बातों का रुख़ मोड़ते हुए उसे खेलने के लिए कहा. वह फ़ौरन बोल उठा,‘मुझे तो वीडियो गेम खेलना है गनवाला, ढुशूं-ढुशूं... कितना मज़ा आता है. बाहर खेलने नहीं जाना. सब गंदे बच्चे हैं. लड़ते रहते हैं.’ मैं उसका मुंह ताकती रह गई. वह आत्मकेंद्रित होने लगा है और अभी से ही स्वयं को सबसे बेहतर समझने की भावना उसमें पैदा होने लगी है. पिछले महीने मेरी एक सहेली लंबे समय के अंतराल पर घर आई. हम दोनों गपशप में लीन थे. तभी श्लोक स्कूल से घर लौटा. उसके घर मे अंदर क़दम रखते ही मैंने कहा,‘बेटा, आंटी को नमस्ते करो.’ वह मुंह चिढ़ाकर हंसता हुआ भीतर चला गया. वहीं उसने एक ओर बस्ता फेंका, जूते उतारकर डाइनिंग टेबल के पास धकेल दिए. मोज़े उतारकर उछाले तो वे सोफ़े पर आ गिरे. मैंने उसे क्रोध से देखते हुए कहा,‘श्लोक, ये क्या कर रहे हो? सब सामान, अपने कमरे में ले जाकर रखो.’ वह फिर से मुंह चिढ़ाकर हंसता हुआ अंदर भाग गया सच, मम्मी जी! उस दिन मुझे इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई कि बता नहीं सकती. मेरी सहेली क्या सोच रही होगी? मुझ जैसी शिक्षित, आधुनिक का इंटरनैशनल कोर्सवाले कॉन्वेंट स्कूल में पढ़नेवाला बेटा इतना बद्तमीज़, ढीठ व बिगड़ैल है? क्या मैं उसे सामान्य शिष्टाचार भी नहीं सिखा सकती? आठ साल का बच्चा कम्प्यूटर चला लेता है, टीवी रिमोट हाथ में रखकर चैनल बदल-बदलकर अपने पसंदीदा प्रोग्राम देखता है, लेकिन सामान्य शिष्टाचार, बड़ों का आदर, अभिवादन करने से कतराता है. आख़िर यह कौन-सी संस्कृति अपना रही है नई पीढ़ी? और क्यों?
अचानक मुझे उस दिन की घटना याद आ गई. जब आपने मेरे सामने ही श्लोक से कहा था,‘बेटा, सबेरे उठकर घर के बड़ों से आर्शीवाद लेना चाहिए. रोज पापा, मम्मी, दादी के पैर छूकर प्रणाम किया करो...’ मैं बीच में ही बोल उठी थी,‘मम्मी जी, आप भी अभी तक पुरानी रुढ़ियों में जकड़ी हुई हैं. आज ज़माना कहां पहुंच गया है. अब तो सभी हाय, हैलो कहकर आगे बढ़ जाते हैं. पैर छूना, झुकना, हाथ जोड़ नमस्कार करना पुरानी बातें हो गई हैं. आपने टोकते हुए कहा था,‘‘हाय’ तो हमारे यहां दुर्भाग्य के लिए प्रयोग होने वाला शब्द हैं. अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ाने का यह मतलब तो नहीं कि अपनी संस्कृति भुलाकर उनकी अपनाना शुरू कर दें!’ लेकिन मुझे आपकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. काश, उस दिन आपकी बातों को अहमियत दी होती.
मुझे वह वाक़या भी याद आ रहा है, जब आपने श्लोक से कहा था,‘आओ बच्चे, तुम्हें बड़ी अच्छी कहानी सुनाती हूं. श्लोक बैठ गया. आपने कहानी शुरू ही थी,‘एक राजा था...’ तभी मैं बीच में बोल उठी थी,‘आप भी मम्मी जी, कमाल करती हैं. लोग चांद पर पहुंच रहे हैं और आप अभी तक राजा-रानी और परियों की काल्पनिक, मनगढ़ंत कहानियां लेकर बैठी हैं. आख़िर इससे बच्चों का क्या भला होगा?’ आपने कहा था,‘बहू, इन काल्पनिक कहानियों में मनोरंजन के साथ-साथ साहस, बहादुरी, बुद्धिचातुर्य का पुट भी होता है. बच्चों को अच्छी शिक्षाएं, सीख भी मिलती हैं.’ पर मैं कहां आपके तर्क माननेवाली थी? हम दोनों को बहस करते देख श्लोक भाग खड़ा हुआ था. बाद में आपने दो-चार बार फिर उसे कहानी सुनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह स्पष्ट इंकार कर देता था,‘मुझे नहीं सुननी झूठी कहानी. मैं कार्टून फ़िल्म देखूंगा’ कभी टीवी पर तो कभी कम्प्यूटर पर वह कार्टून फ़िल्में लगाकर लगातार बैठा रहता और मैं ख़ुश होती रहती कि बेटा अंग्रेज़ी फ़िल्में देखकर स्मार्ट हो रहा है. पर मेरी सोच कितनी ग़लत थी.
उस दिन कम्प्यूटर पर वह कोई गेम खेल रहा था. मैं अपनी सहेली से फ़ोन पर गपशप कर रही थी. फ़ोन रखने के बाद किसी काम से कम्प्यूटर रूम में गई. श्लोक बड़ी मग्नता से देख रहा था. पीछे खड़ी मैं कम्प्यूटर स्क्रीन देखकर हक्की-बक्की रह गई. इंटरनेट सर्फ़ करते हुए कोई अश्लील वेबसाइट उससे खुल गई थी और एक अर्धनग्न युवती की कोमोत्तेजक तस्वीर वह बड़े ग़ौर से देख रहा था. मुझे कुछ सूझा नहीं और मैं एकदम चीख उठी. ‘श्लोक, यह क्या कर रहे हो...?’ मुझे सामने देख पल-भर के लिए वह डर गया, फिर कुछ क्षणों में ही उसके चेहरे के भाव बदल गए. कुटिल मुस्कान के साथ बाला,‘पापा भी तो देखते हैं. मैंने एक दिन देखा था. आप उन्हें तो नहीं डांटतीं? मुझे क्यों डांट रही हैं?’ मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. सिर घूमने लगा. श्लोक के चेहरे पर जो बालसुलभ चंचल, मोहक मुस्कान होनी चाहिए थी, वहां तो मुझे आफ़त की घंटी सुनाई देने लगी थी. समीर से जब इस बात का ज़िक्र किया तो उन्होंने मुझे ही दोषी ठहराया,‘सारा दिन घर में रहती हो. तुमसे एक बच्चे की परवरिश ढंग से नहीं होती?’ उस वक़्त मुझे आपके कहे शब्द बार-बार प्रतिध्वनित होते महसूस हुए,‘बहू, बच्चे को जन्म देना आसान है, लेकिन उसकी सही परवरिश, संस्कार, नैतिक मूल्यों से शिक्षित करके अच्छा इंसान बनाना बड़ा मुश्क़िल है.’ सच मम्मी जी, मुझे तो समझ नहीं आ रहा, अपने इकलौते बच्चे को कैसे हैंडल करूं? पता नहीं आपके ज़माने की महिलाएं कैसे चार-पांच बच्चों की सही परवरिश कर लेती थीं! एक दिन मैं टीवी पर अपना पसंदीदा सीरियल देख रही थी. तभी श्लोक आकर किसी चीज़ की ज़िद करने लगा. मैंने उसे चुप कराने की कोशिश की लेकिन वह चीखने-चिल्लाने लगा. सीरियल देखने में व्यवधान पड़ता देख मुझे क्रोध आ गया. फिर भी उसे मनाने की गरज से मैंने कहा,‘कुछ देर खेल लो, सीरियल ख़त्म होते ही तुम्हें वह चीज़ दे दूंगी.’ वह बड़े आवेश से बोला,‘हमेशा कहती हो, जाओ खेलो. किसके साथ खेलूं? न मेरा कोई भाई है, न बहन. मेरे सारे फ्रेंड्स तो अपने भाई-बहन के साथ खेलते हैं...’ मुझे ऐसा लगा जैसे श्लोक ने सरेआम मेरे मुंह पर तमाचा जड़ दिया हो. एक बच्चे तक ही परिवार को सीमित रखने का मेरा निर्णय कितना ग़लत था, अब मुझे महसूस होने लगा था. समीर ने तो कई बार दूसरे बच्चे की ख़्वाहिश ज़ाहिर की थी, पर मैं इस ज़िद पर अड़ी थी कि एक बच्चा ही काफ़ी है. इस बारे में आपने भी मुझे समझाया था,‘बहू, इकलौता बच्चा ज़िद्दी, अड़ियल, बिगड़ैल हो सकता है. चूंकि अकेला होने के कारण उसकी हर मांग पूरी हो जाती है. उसे सभी सुख-सुविधाएं मुहैया कराई जाती है इसलिए उसमें केवल लेने की प्रवृत्ति ही बनी रहती है. मिल-बांटने की, देने की प्रवृत्ति न बन पाने के कारण वह स्वार्थी आचरण का बन जाता है. कहीं-कहीं तो ऐसे बच्चे एकाकीपन का शिकार बन जाते हैं, जिसके चलते मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, कुंठा तक पनपने लगते हैं. फिर बच्चों को रिश्तों के अर्थ, आत्मीयता, लगाव आदि के बारे में कहां जानकारी होती है. पहले के परिवारों में दो-तीन होते थे. घर वाक़ई घर लगता था. हल्ला-गुल्ला लड़ना-झगड़ना, मिल-बांटकर खाना, एक-दूसरे के प्रति स्नेह, प्रेम, सहयोग की भावना से घर में रौनक लगी रहती थी. अब एक बच्चे वाले एकल परिवार में सन्नाटा पसरा होता है...’
मैंने फ़ौरन बात काट दी थी,‘मुझे नहीं चाहिए बच्चों का शोर-शराबा. मैं ऐसे ही ख़ुश हूं. हमारे परिवार में एक श्लोक ही काफ़ी है.’ आप चुप लगा गई थीं.
अभी पिछले दिनों ही मैंने देखा, अपने दोस्त से फोन पर बातें करते हुए श्लोक बीच-बीच में गंदी भाषा का प्रयोग कर रहा था. अंग्रेज़ी में गालियां दे रहा था. मेरे मना करने पर बोला,‘कम ऑन ममा, आजकल सब ऐसे ही बातें करते हैं. हमारे स्कूल में तो सभी ऐसे ही बोलते हैं.’ मुझे लगता है, आज के बच्चों में बचपन तो रहा ही नहीं है. बालसुलभ चंचलता, शरारतों के स्थान पर वे सीधे वयस्कों की भाषा बोलने लगे हैं. जिन बातों को जानने-समझने की उनकी उम्र नहीं है, उन्हें भी वे प्रसार-माध्यमों की कृपा से जानने लगे हैं. शायद इसलिए बाल-अपराधियों की संख्या बढ़ रही है. मम्मी जी, मुझे बहुत तनाव, चिंता लगी रहती है, कहीं हमारा श्लोक बहककर ग़लत रास्ते पर न चल पड़े. उसके व्यवहार, हरकतों से काफ़ी परेशान हूं समझ नहीं आता, उसका कैसे मार्गदर्शन करूं.
डैडी जी के गुज़रने के बाद समीर के ज़ोर देने पर आप हमारे पास रहने आई थीं. उस वक़्त आपको सुरक्षा, भावनात्मक संबल, आदरभाव, अपनत्व सहयोग की बहुत ज़रूरत थी, क्योंकि आप एकदम अकेली हो कई थीं. लेकिन मैंने इस बात को नहीं समझा. आपके साथ किए गए व्यवहार पर अब मैं आत्मग्लानि से शर्मिंदा हूं. समीर और मैं बहुत सोच-विचार के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अब आप हमेशा के लिए हमारे साथ रहें. अपने दुर्व्यवहार की क्षमा मांगते हुए हम आपसे प्रार्थना तो नहीं कर रहे, लेकिन आपके बच्चे होने के नाते अधिकार से आग्रह करते हैं कि आप शीघ्र ही अपनी तैयारी करके रखें. आपको अब हमारे साथ ही रहना है तथा श्लोक की परवरिश करने में हमारा मार्गदर्शन करना है. हम चाहते हैं, अगर ईश्वर ने उसे तीक्ष्ण बुद्धि दी है तो उसके सही उपयोग से वह एक नेक, सफल, अच्छा व बड़ा आदमी बने. इसके लिए आपको ही उसे संभालना है. आप उसे जीवन-मूल्यों, संस्कार, नीति-चरित्र की कहानियां सुनाएंगी. उठने-बैठने, बोलने, खाने का तरीक़ा सिखाएंगी. शिष्टाचार, अनुशासन, लोक-व्यवहार की शिक्षा देंगी तो मैं तनिक भी हस्तक्षेप नहीं करूंगी. आपकी उपेक्षा व तिरस्कार करके मैं पहले ही पश्चाताप से ग्रसित हूं. आशा है, क्षमा कर देंगी. और हां, मम्मी जी, आजकल मैं दूसरे बच्चे के बारे में गंभीरता से सोचने लगी हूं. सचमुच श्लोक को अपने प्यार-स्नेह, खिलौनों, सामान, शरारतों आदि का हिस्सेदारी के लिए एक साथी की ज़रूरत है. यह उसका अधिकार भी है और इससे वंचित रखकर उसके साथ हम अन्याय ही तो कर रहे हैं. रिश्तों, संबंधों की गर्माहट का एहसास रिश्ते बनने पर ही तो होगा न! आप पूरी तैयारी करके रखिए, अगले सप्ताह हम तीनों आपको लेने आ रहे हैं.
आपकी बहू
मीता

- नरेन्द्र कौर छाबड़ा 
- Dev Gupta के “कहानी आज की” नामक FB ग्रुप से साभार।

Monday, August 3, 2020

शोकेस में कैद ज़िंदगी


शोकेस में कैद ज़िंदगी

 मीतू की ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं था. इस बार छोटी मामी के यहां जो जा रहे हैं, वरना हर बार गर्मी की छुट्टियों में बड़ी मामी के ही घर जाना होता था. हालांकि ऐसा नहीं है कि मीतू को बड़ी मामी के यहां अच्छा न लगता हो. उसका भाई मोनू और मामा के बच्चे मिनी-चीनू दिनभर साथ खेलते,लड़ते-झगड़ते. झगड़ा हो, तो रूठकर अलग-अलग बैठ जाते, पर कितनी देर? पलभर में ही फिर दोस्ती हो जाती. पता ही नहीं चलता कि कैसे एक महीना बीत गया. वापस लौटते समय चारों बच्चों की आंखें भर आती थीं. पर जो भी हो, छोटी मामी की तो बात ही अलग है. मामा-मामी दोनों ही शहर के जाने-माने डॉक्टर हैं. जब भी मम्मी-पापा छोटे मामा-मामी की बातें करते, तब आठ साल की मीतू उनकी बातें सम्मोहित होकर सुनती. बड़ी मामी के मकान से बड़ा तो छोटी मामी के घर का लॉन ही है. प्लाज़्मा टीवी, डिशवॉशर, कारें और न जाने क्या-क्या है उनके पास, जबकि बड़े मामा के पास तो केवल साधारण टीवी, कूलर और बाइक ही है.
 मीतू की मां हमेशा गर्मियों की छुट्टी में मायके जाती थीं. नाना-नानी तो रहे नहीं, लेकिन बड़ी मामी मायके का सारा उत्तरदायित्व अपनेपन से निभाती आ रही हैं. इस बार प्रोग्राम यूं ही बदल गया. हुआ यूं कि बड़ी मामी का क्षमा मांगते हुए फोन आया कि इस बार भाई की शादी में उन्हें बनारस जाना पड़ रहा है. इस पर पापा यूं ही मज़ाक में बोले, “अरे विनीता, तुम्हारे छोटे भाई डॉक्टर साहब भी तो हैं. वहां क्यों नहीं हो आती?” मम्मी कई सालों से वहां नहीं गई थीं. छोटे मामा-मामी शिकायत भी करते कि आप कभी हमारे यहां नहीं आतीं. बस, पापा ने मम्मी, मीतू और मोनू का रिज़र्वेशन कराकर मामा को बता दिया. मीतू अपने ख़्यालों में ही खोई थी कि पीछे से विनीता की आवाज़ आई, “बेटा, क्या सोच रही हो? चलो, स्टेशन आ गया.”
विनीता की निगाहें प्लेटफॉर्म पर अभि को ढूंढ़ रही थीं. तभी एक व्यक्ति हाथ में मिसेज़ विनीता का प्लेकार्ड लिए दिखा. विनीता पास गई, तो उसने पूछा, “मिस़ेज विनीता?”
 “हां! पर आप?” उसने एक काग़ज़ बढ़ा दिया. ‘दीदी, मैं बिज़ी हूं, इनके साथ आ जाना- अभि.’ घर पहुंचकर मीतू क्या, विनीता की भी आंखें खुली की खुली रह गईं. पहलेवाले सामान्य मकान की जगह एक विशाल बंगला खड़ा था.
 “अभि और अनीता कहां हैं?” कार से उतरते ही विनीता ने पूछा.
 “सर और मैम नर्सिंग होम में हैं.” फिर वह हमें एक एयरकंडीशंड गेस्टरूम में पहुंचा गया. एक आया कोल्ड ड्रिंक्स और स्नैक्स रख गई. मीतू बोली, “मामी कब आएंगी?”
 “थोड़ी देर में आ जाएंगी बेटा.” कहकर विनीता सोचने लगी कि बच्चों को तो उसने बहला दिया, पर ख़ुद को कैसे बहलाए? दीवार पर लगे
 प्लाज़्मा टीवी पर कार्टून देखकर बच्चे उत्साहित थे, पर विनीता ऊब रही थी. लगभग ढाई बजे एक नौकर ने आकर कहा, “सर डाइनिंग हॉल में आपको बुला रहे हैं.”
 मीतू-मोनू को लिए विनीता उनके साथ दो गैलरी पारकर पहुंची. अभिजीत वहीं बैठे-बैठे बोला, “आओ दीदी, कैसी हो?” अनीता ने भी बड़े औपचारिक तरी़के से नमस्ते किया. बच्चों ने मामा को नमस्ते किया और अपरिचित व औपचारिक माहौल के कारण मीतू विनीता की गोद में बैठ गई, तो मामी नमस्ते का जवाब देने की बजाय डांटते हुए बोली, “व्हाट आर यू डूइंग? तुम बड़ी हो गई हो, हैव ए सेपरेट सीट.” बेचारी मीतू को अपनी क्लास टीचर याद आ गई.
 “दीदी, अभी आराम कर लो. मैंने एक गाड़ी तुम्हारे लिए रिज़र्व कर दी है. जहां घूमना हो, चली जाना.” अभि खाते हुए बोला.
 “कल तुम्हारा क्या प्रोग्राम है अभि?” विनीता अनमने ढंग से बोली.
 “क्या बताएं दीदी, कल सारा दिन बिज़ी हूं. छह ऑपरेशंस हैं. वैसे कल ही क्या, सच बताऊं तो अपनी ज़िंदगी में तो फुर्सत नाम की चीज़ ही नहीं है. देखो, कल लंच या डिनर पर मिलते हैं.”
 विनीता का मन हुआ कि पूछ ले कि अपने लिए समय नहीं है या अपनों के लिए? मगर चुप रही. तभी उसे बंटू याद आया. पिछली बार दो साल का बंटू उसके साथ कितना खेलता था, अब तो क़रीब दस साल का हो गया होगा.
 “अच्छा, बंटू कहां है? सुबह से दिखा नहीं?”
 “अच्छा ऋत्विक?” अनीता ऐसे बोली जैसे बंटू नाम अपमानजनक लगा हो. “उसे हमने बहुत पहले बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया. आजकल बच्चों को साथ रखकर उनकी लाइफ बना पाना तो इम्पॉसिबल है ही, अपनी लाइफ भी स्पॉइल करना है. हम लोग तो जैसे अर्न कर रहे हैं, वैसे ही बर्न भी कर रहे हैं. वहां उसका करियर बन रहा है, यहां हमारा. क्यों अभि?” अनीता क्या कहना चाह रही है, विनीता सहज ही समझ गई.
 “अच्छा दीदी रेस्ट कर लो, फिर शाम को गाड़ी लेकर हज़रतगंज घूम आना. मेकओवर होने से एकदम बदल गया है.” कहकर अभि उठा, तो विनीता का मन हुआ कि कह दे- मेकओवर से तुम भी तो कितने बदल गए हो अभि.
 विनीता फिर उस गेस्टरूम में आ गई, तो सोचने लगी कि व्यस्त होना दूसरी बात है और परस्पर अपनत्व बनाए रखना दूसरी. दिलों में प्यार और रिश्तों में अपनापन हो, तो दो पल की मुलाक़ात में ज़िंदगी कितनी संवर जाती है. माना इनकी ज़िंदगी व्यस्त है, पर क्या सफलता इंसान को इतना बदल देती है? एक लक्ष्य लिए इतना भी क्या शुष्क हो जाना कि रिश्ते, संवेदनाएं और अपनापन तक भूल जाओ.
 ‘क्या यह वही अभि है, जो बचपन में दीदी-दीदी करता आगे-पीछे घूमता और कितना प्यार करता था मोटिवेट और गाइड करनेवाली अपनी दीदी को और वो भी कितना प्यार करती थी उसे. एक बार मौसी ने यूं ही हंसी में कह दिया था, ‘चाहे जितना प्यार कर ले इसे, शादी हुई नहीं कि भूल जाएगा तुझे.’ इस पर अभि उनसे कितना नाराज़ हो गया था.
 आज विनीता का एकाकी मन जाने कहां-कहां भटक रहा था. अभि को डॉक्टर बनाने का सपना उसका ही था. अभि मेडिकल की तैयारी कर रहा था तो उसकी वजह से वो रात-रातभर जागती. चाय-कॉफी देती. अभि ने सिलेक्शन का सारा श्रेय उसे ही दिया था. इधर अभि का सिलेक्शन, उधर विनीता का विवाह विनय से तय होने से पापा बहुत ख़ुश हुए. विनीता की विदाई के समय अभि कितना फूट-फूटकर रोया था.
 मेडिकल कॉलेज से भी जब-तब उसके फोन आते. वो दीदी से ही सलाह लेता, जो उसकी निगाह में सबसे जीनियस थीं. धीरे-धीरे फोन जन्मदिन, सालगिरह, नववर्ष तक सीमित होने लगे. फिर अभि ने अनीता से विवाह का निर्णय लिया और शायद यह पहला निर्णय था, जिसमें विनीता कहीं भी शामिल न थी. एक दिन अभि का फोन आया, “दीदी, मेरा एमएस पूरा होनेवाला है. अनीता गाइनिक में एमएस कर ले, तो हम विवाह कर लेंगे. तुम तो जानती ही हो आजकल ख़ुद को सेटल करने में कितना स्ट्रगल करना पड़ता है. पापा की आदर्शवादी ज़िंदगी के कारण उनसे तो क्लीनिक की भी उम्मीद नहीं है, जबकि अनीता के चीफ इंजीनियर पिता हम लोगों के लिए एक बढ़िया नर्सिंग होम खुलवा रहे हैं. देखना, मैं किस मुक़ाम तक पहुंच जाऊंगा. बस, तुम्हारा आशीर्वाद चाहिए.”
 बिना उससे डिस्कस किए अभि ने इतना बड़ा फैसला कर लिया? विनीता तो सोच रही थी कि अभि से बात नहीं करेगी, पर विनय ने समझाया, “आपका भाई अब कोई बच्चा नहीं है, जो दीदी-दीदी करता आपके आगे-पीछे घूमे. अपनी ज़िंदगी किसके साथ और कैसे बितानी है वह आपसे बेहतर जानता है. अपना ईगो छोड़कर उसे आशीर्वाद देने चलो.”
 अनीता का साथ क्या मिला, दोनों पर बस एक ही धुन सवार हो गई कि नर्सिंग होम को कैसे बढ़ाया जाए. विनीता को किसी से पता चला कि अभि ने पैसे कम होने के कारण पेशेंट को ऑपरेशन के लिए एडमिट करने से मना कर दिया था, तो उसे विश्वाेस ही नहीं हुआ. बचपन में कितना संवेदनशील था उसका अभि. एक दिन फोन पर यूं ही पूछने पर अभि हंसकर लापरवाही से बोला, “आप भी किस ज़माने की बात कर रही हो दीदी. हम लोग क्या परोपकार करने के लिए नर्सिंग होम चला रहे हैं? हमारी भी कितनी ज़रूरतें हैं, जो अफोर्ड कर सकें वो आएं, वरना ये सरकारी अस्पताल किसलिए खुले हैं?”
 धीरे-धीरे विनीता घर-परिवार की बढ़ती ज़िम्मेदारियों में उलझती गई और अभि अपनी महत्वाकांक्षाओं के सहारे आकाश को छूने में बिज़ी हो गया. विनीता के जीवन में अगर कुछ नहीं बदला था, तो वो था बड़ी भाभी का अपनापन. उसे याद है, अंतिम तीन महीने मां बिस्तर पर रहीं, पर भाभी ने उ़फ् तक नहीं की. रोज़ बिस्तर पर नित्यकर्म कराना, अपने हाथों से खिलाना-पिलाना. जाते-जाते मां की आंखों में कितना संतोष था. मां की आंखों के कोरों से बहते आंसुओं में दुख की जगह संतुष्टि और भाभी के लिए आशीर्वाद ही दिखता. घर के सारे रीति-रिवाज़ों को ख़ूबसूरती से आत्मसात कर चुकीं, एमएससी टॉपर भाभी ने मां की बीमारी के बाद नित्य आरती से लेकर सारे कामों को इस कुशलता से संभाला कि बुआ और चाची तक को उनसे ईर्ष्या होने लगी.
 मां के न रहने से गुमसुम पापा सालभर में ही चले गए, तो विनीता रो-रोकर पागल-सी हो गई थी. उसके मन में कहीं यह बात आ गई कि अब मायका नहीं रहा, यह भांपकर भाभी बोलीं, “दीदी, आप नहीं जानतीं अब मैं कितनी अकेली हो गई हूं. यह घर पहले की ही तरह आपका है और एक वचन दीजिए, आप हर बार गर्मी की छुट्टियों में यहां आती रहेंगी.” विनीता भाभी की समझदारी और व्यावहारिकता पर हैरान रह गई. तब से शुरू हुआ सिलसिला, आज तक चला आ रहा है.
 अगली सुबह कार तैयार थी, जिसमें कोल्ड-ड्रिंक्स, चिप्स और कई रेडीमेड पैकेट्स रखे थे. हम लोग चिड़ियाघर गए, पर विनीता हैरान थी कि बच्चों को जिन चीज़ों से लगाव था, उन्हें वे छू भी नहीं रहे थे. बस, मिनी-चीनू की ही बातें करते रहे कि वे भी साथ होते तो यह करते, वह करते. विनीता को लगा जैसे वो किसी अजनबी दुनिया में आ गई है, जहां ऐशो-आराम के सारे साधन तो उपलब्ध हैं, मगर जीने का मक़सद नहीं है. ज़िंदगी जीने के लिए कुछ बहानों की ज़रूरत होती है, पर वे इतने खोखले व रस्मी होंगे, विनीता ने कल्पना भी नहीं की थी. उसे लगा अभि ने उसके सामने ज़िंदगी का दूसरा पहलू तमाचे की तरह रख दिया हो और कह रहा हो, ‘दीदी, तुम्हें बहुत नाज़ है न अपने दृष्टिकोण पर? लो देखो, ज़िंदगी तो बस भौतिक सुखों के भोग के लिए है. रिश्ते, एहसास, संवेदना, मूल्य, आदर्श ये सब फ़लस़फे बहस के लिए अच्छे हैं, मगर इनके सहारे ज़िंदगी नहीं जी जा सकती.’
शाम को फिर वही गेस्टरूम, वही आया और नौकर. ऊबकर मीतू-मोनू ड्रॉइंगरूम पहुंच गए. तरह-तरह के विदेशी खिलौने, कांच के सामान, बनावटी चिड़िया, छोटी-सी साइकिल, मुखौटे पता नहीं क्या-क्या शोकेस में सजे थे. मीतू ने कांच के एक सारस को उठाया कि छोटी मामी का तेज़ स्वर कानों में टकराया, “डोंट टच. रखो उसे.”
 घबराहट में उसके हाथों से सारस गिरकर टूट गया, तो मीतू ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी. मामी का चिल्लाना जारी था. “इतनी बड़ी हो गई हो, पर मैनर्स ही नहीं हैं. पता नहीं, दूसरे के घर कुछ भी नहीं छूते हैं.” रोते-रोते मीतू सोच रही थी कि यह किसी दूसरे का नहीं मेरे छोटे मामा का घर है.
 तभी विनीता आ गई, तो छोटी मामी बोलीं, “आई कांट टॉलरेट दीज़ हैबिट्स. चिल्ड्रेन मस्ट नो मैनर्स एंड एटीकेट्स. ऋत्विक की मजाल है, जो कुछ भी छू ले? तुरंत सज़ा देती थी मैं. एनी वे डोंट माइंड.” कहकर वो चली गईं. सिसकती हुई मीतू को याद आया एक बार बड़ी मामी के घर उससे महंगी प्लेट टूटने पर मम्मी ने डांटा, तो बड़ी मामी ने उसे गोद में लेकर चुप कराते हुए कहा, “प्लेट मेरी बिटिया से क़ीमती थोड़े ही है. प्लेट तो टूट गई, पर आप उसका दिल क्यों तोड़ रही हैं?” मीतू को सब बुद्धू समझते हैं, पर वो प्यार और अपनापन ख़ूब समझती है.
 रात को सपने में उसे छोटी मामी का शोकेस दिखा. तरह-तरह के ढेर सारे खिलौने, पर कैद में एकदम उदास लग रहे थे, जिनमें ज़िंदगी का नामो-निशान नहीं था. फिर वो बड़ी मामी के घर पहुंच गई. वहां न दिखावटी खिलौने थे, न बनावटी ज़िंदगी.
खिलौने महंगे तो नहीं थे कि छूना मना हो और शोकेस में सजे रहें. ज़िंदगी से भरे साधारण खिलौने चाहे जैसे खेलो न टूटने का डर, न डांट पड़ने का. वो, मोनू, मिनी-चीनू उन खिलौनों से खिलखिलाते हुए खेल रहे थे कि अचानक छोटी मामी ने आकर मीतू को उठाया और वो खिलौनेवाली डॉल बन गई, जिसे मामी ने शोकेस में सजा दिया.
 बेचारी मीतू चिल्ला-चिल्लाकर रो रही थी, पर उसकी आवाज़ शोकेस से बाहर नहीं जा रही थी. आवाज़ सुनकर विनीता की आंख खुली, तो देखा मीतू नींद में रोते हुए घुटी-घुटी आवाज़ में चिल्ला रही थी, “मुझे इस शोकेस से बाहर निकालो, मुझे इस शोकेस से बाहर निकालो.” विनीता ने उसे गले लगाकर कहा, “हां, बेटा हम लोग कल ही यहां से लौट चलेंगे.” बस फिर क्या, मीतू सपने में शोकेस से बाहर आकर फिर खिलखिलाते हुए मोनू, मिनी-चीनू के साथ खेलने लगी.

- शादी से पहले जो व्यवहार भाई – बहनो में होता है, वो शादी के बाद बदल क्यों जाता हैं? आप इस संबंध में क्या कहना चाहेंगे? आपके महत्वपूर्ण विचारों (Comments) की अपेक्षा है ...

 श्री देव गुप्ता के कहानी आज की नामक फेसबुक पेज से साभार,

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