Sunday, September 9, 2018

पिशाच का बदला

दोस्तों ये कहानी अंतर्जाल से ली गई है
16 June 2007, 63 वर्षीय साहिब सिंह वर्मा मजबूत कद काठी वाले धनाडय व्यक्ति थे । 42 सदस्यों वाले साहिब सिंह का संयुक्त परिवार और उनका अमीरी रहन सहन पुराने जमाने के किसी जमीदार की याद दिलाता था ।
साहिब सिंह खुद लेखपाल पद पर सरकारी नौकरी कर चुके थे । और उनके आठ पुत्र भगवान की कृपा से पुलिस । इनकम टेक्स । इंजीनियर जैसे पदों पर नौकरियां कर रहे थे । कुल मिलाकर पैसा उनके यहां आता नहीं था । बल्कि बरसता था । नौकरी के अलावा खेती । ट्रेक्टर और ट्रकों से उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती थी ।
साहिब सिंह से मेरी मुलाकात । मानसी विला । पर कुछ ही देर पहले शाम तीन बजे हुयी थी । पांच हजार वर्ग मीटर जगह में बना मानसी विला चार मंजिला महल के जैसा था । जिसके ऊपर की तीन मंजिले आफ़िस के उद्देश्य से किराये पर उठी हुयी थी ।
और ग्राउंड फ़्लोर पर दो हजार वर्ग मीटर में बना सेपरेट पोर्शन नीलेश दी ग्रेट के निजी प्रयोग के लिये था । शेष तीन हजार वर्ग मीटर की भूमि आफ़िसों के वाहन आदि के उद्देश्य से बनी थी ।
नीलेश मेरा मित्र और एक अच्छा साधक था । मानसी उसकी प्रेमिका का नाम था । मानसी विला में नीलेश के परिवार का कोई भी सदस्य नहीं रहता था । उसकी देखभाल के लिये महादेव और ऊषा नामक दम्पत्ति नियुक्त थे । जो आसाम के रहने वाले थे ।
मानसी विला की उपरली तीन मंजिलो से ढाई लाख रुपया मंथली किराया आता था । जो नीलेश दी ग्रेट की पाकेट मनी के काम आता था । इस सबके बाबजूद मानसी विला पर मेरा या नीलेश का मिलना ईद के चांद जैसा ही था ।










SOURSE- HINDIVICHARMUNCH

Saturday, September 8, 2018

प्रेतकन्या

दोस्तों ये कहानी अंतर्जाल से ली गई है



 ये बात लगभग बीस साल पुरानी होगी । संजय मेरा दोस्त था । हम दोनों एक ही कालेज में थे । पर मैं उससे एक क्लास आगे था ।इसके बाबजूद मेरी उससे मित्रता थी । संजय और उसका परिवार किसी अन्य प्रदेश से थे ।और नौकरी की वजह से उत्तर प्रदेश में रहने के लिये आ गये थे ।
जाने क्या वजह थी । संजय मुझे बहुत दिनों से दिखायी नहीं दिया था । शायद इसकी एक वजह ये भी हो सकती थी कि मैं स्वयं कालेज के बाद अपने शोध हेतु वन क्षेत्र के एक निर्जन और गुप्त स्थान पर चला जाता था । और प्रायः घर और शहर में कम ही रहता था ।  लेकिन उस दिन जब मैं बाजार में था । मुझे संजय की मम्मी रजनी आंटी की आवाज सुनायी दी - हेय प्रसून ! क्या ये तुम
हो..जरा सुनो । मैंने स्कूटर रोक दिया । रजनी आंटी मेरे करीब आ गयी । वे
बेहद उदास नजर आ रही थी । - संजय कैसा है । और आजकल दिखायी नहीं देता ? मैंने
आंटी से पूछा । - मैंने उसी के बारे में बात करने के लिये तुझे रोका है । तुमने एक बार बताया था कि तुम वनखन्डी गुफ़ा में रहने वाले बाबा से परिचित हो । और अक्सर वहाँ आते जाते भी रहते हो ।
प्लीज प्रसून ! मैं बाबाजी से मिलना चाहती हूँ । तुम्हारे दोस्त
की खातिर । अपने बेटे की खातिर । मामला सीरियस था । आंटी डरी हुयी सी प्रतीत होती थी ।
मुझे आश्चर्य था कि आज वे बाबाजी के बारे पूछ रही थी । और कभी इस पूरे परिवार ने मेरी हंसी इस बात को लेकर बनायी थी कि दृश्य जगत के अलावा भी कोई अदृश्य जगत है ।
- आप मुझे कुछ तो हिंट दें । मैंने कहा - बाबा.. यूं एकाएक किसी से नहीं मिलते । और आप जिस वजह से बाबा से मिलना चाहती हैं । वह उचित है भी । या नहीं ?
आंटी ने मुझे भीङ से हटकर एक तरफ़ आने का इशारा किया । और एकान्त में आते ही बोली - प्रसून ! तीन महीने से संजय कुछ अजीब......मेरे बेटे को किसी तरह उससे बचा लो ?मामला वाकई गम्भीर था । मैंने पूछा - संजय अक्सर कहाँ मिलता है ?
थी कि दृश्य जगत के अलावा भी कोई अदृश्य जगत है ।
- आप मुझे कुछ तो हिंट दें । मैंने कहा - बाबा.. यूं एकाएक किसी से नहीं मिलते । और आप जिस वजह से बाबा से मिलना चाहती हैं । वह उचित है भी । या नहीं ?








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by Rajeev shreshtha
sourse- hindivicharmunch
 




सन्यासी (तन्त्र-मन्त्र की दुनिया )

सन्यासी



इसमें लिखे गए सभी वृतांत काल्पनिक है और केवल मेरे मित्रो के मनोरंजन के उद्देश्य से लिखे गए है
रात के सवा बारह का समय था। अमावश्या की काली रात थी। सुनसान सड़क पर हमारी हार्ड टॉप जिप्सी फर्राटे भरती हुवी यमुना के किनारे की सड़क पर भागी जा रही थी। सड़क पर निशाचर जीव जन्तुवो का भी नामो निशान नहीं था। शायद दिन भर मई की धुप के थपेड़े खा के सभी अपने रेन बसेरो में आराम कर रहे थे। जिप्सी की हेडलाइट में कुछ कीट अवश्य अपनी उपस्थित दर्ज करके मानो ये इंगित करने की कोशिश कर रहे थे की हम इलाहाबाद का शहरी इलाका छोड़ अब बियावान के हवाले है। बुजुर्ग ड्राइवर प्रह्लाद सिंह यादव जी की चौकस निगाहे सड़क पे जमी हुवी थी। ६२ साल की उम्र में भी वो बुजुर्ग फौजी दम ख़म और हिम्मत में आज के सामान्य जवानों को मात देते लगते थे। 
शहरी छेत्र में सड़क थोड़ी अच्छी थी तो मैंने और दमन सिंह ने थोड़ी झपकी ले ली थी। बस अब तो खुली आँखों से सड़क के गड्ढों के हवाले थे कुछ अपने मित्र दमन सिंह के बारे में बता दू। मेरे हम उम्र हम प्याला हम निवाला मेरे जिगरी दोस्त। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के पढ़ाई के दौरान शुरू हुवी दोस्ती कब प्रगाढ़ होती चली गईपता ही न चला। उन्होंने इतिहास से MA किया फिर कुछ और करने को न था तो पीएचडी भी कर डाली। अभी भारत के पुरततव विभाग ने बड़े अफसर है। प्राचीन इतिहास के सम्बन्द में खोज का अच्छा अनुभव रखते है.! परा मानवीय विषयों में खासी दिलचस्पी रखते है। 
दमन सिंह पूरा नाम श्री रिपुदमन सिंह अपने नाम के अनुरुप थोड़ा गुसैल स्वाभाव के है। हा मूड में हुवे तो हँसा हँसा के पेट में दर्द पैदा कर दे। बस ईश्वर ने दुनिया पर एक ही उपकार किया। वो कहते है न भगवन गंजे को नाख़ून नहीं देता। महाशय एक दम सिकिया पहलवान के सगे भाई प्रतीत होते हैगुसैल स्वाभाव। किसी की बात सहन करना आता ही नहीं महोदय को। वो तो अपनी हेल्थ से मात खा जाते है नहीं तो क्रुद्ध हो गए तो जलजला ही ला दे सरकार।
दमन सिंह ने ही मुझे काशी से बुलाया था। उन्हें खबर मिली थी की मिल्कीपुर के शमशान के आस पास एक सिद्ध बाबा को भटकता देखा गया है। पैरानॉर्मल विषय में दिलचस्पी और उनकी जिज्ञासा उन्हें मुझे फ़ोन करने पर मजबूर कर गई । तंत्र मंत्र के मेरे शोध की दिशा में कुछ ज्ञानार्जन की अभिलाषा में में भी भागा चला आया। इन विषयों पे दमन कभी अकेले आगे नहीं बढ़ाते। में भी अपंने तंत्र मंत्र के शोध सम्बंधित अभियानों पर सदा उनका साथ चाहता हु।
 
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prem-sagar
 





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