Friday, November 5, 2021

महालक्ष्मी पूजन

 "महालक्ष्मी पूजन"


"पंडित जी ने गोदाम पर दीपावली पूजा का सुबह 6:00 बजे का मुहूर्त बताया है! तुम सारी तैयारी अभी से कर लो"

द्वारका जी दुकान से घर आते ही अपनी पत्नी से बोले।


"अरे वाह !!आज तो आप बड़ी जल्दी  घर आ गए!"


"हां भई! सारा काम काज मुनीम जी के भरोसे छोड़ कर आया हूं। आखिर कल की महालक्ष्मी पूजा की तैयारियां भी तो करनी है।"

"पूजा की बाकी सामग्री तो घर पर ही उपलब्ध हो जाएगी। आप अभी घूमने जाओ तो मालाएं ले आना।"


द्वारका जी ने तुरंत वस्त्र बदले और पड़ोसी शर्मा जी को आवाज लगा शाम की सैर पर निकल गए।


"द्वारका जी, आज पैर बाजार की तरफ कैसे मोड़ लिए?"

भिन्न रास्ते की ओर बढ़ते देख शर्मा जी ने पूछा।

"बस जरा यूं ही, कुछ मालाएं खरीदनी हैं।"


बाजार में फूल मालाओं की स्थाई दुकानों के साथ-साथ जमीन पर टोकरिया लिए अस्थाई विक्रेता भी बैठे थे।


दो तीन जगह माल मोलभाव करने के बाद द्वारका जी को निगाह एक कोने में बैठी छोटी सी टोकरी लिए चौदह पंद्रह साल की लड़की पर पड़ी ‌।


जमी जमाई दुकान वाले एक रुपया भी कम नहीं कर रहे। यही सोच कर वह उस लड़की के पास पहुंचे।


उस की टोकरी में गिनती की मालाएं और फूल थे। शायद आसपास की दुकानों से ही सस्ते भाव में खरीद लाई थी।

"यह हजारे की माला कितने की दी?"

बाबूजी ₹20 की है।

"और गुलाब की माला?"

"₹50 की है।"

"इतना महंगा लगा रही है!  देखती नहीं ऐसी मालाएं 10 10 रुपए में मिल रही है। सही लगा , सारी खरीद लूंगा।" उन्होंने आंखों ही आंखों में बची हुई मालाओं को गिनते हुए कहा।


द्वारका जी को स्वयं की ओर आते देख लड़की की आंखों में आई चमक अब बुझ गई।


"बाबूजी ₹15 की तो मेरी खरीद ही है गुलाब की माला 40 में लाई हूं। कुछ तो मेरे लिए भी बचना चाहिए ना।" उसके शब्दों में बेबसी थी।

"रहने दे! रहने दे! झूठ मत बोल।" कहते हुए द्वारका जी ने पन्द्रह हजारे की मालाएं और तीन गुलाब की मालाएं अलग की‌। अब टोकरी में मात्र दो हजारे की और एक गुलाब की माला ही शेष बची थी।

"बाबूजी यह तीनों मालाएं भी ले लीजिए।"


"देखती नहीं? उनके फूल मुरझा गए हैं !इन्हें लेकर क्या करूंगा?"

और फिर द्वारका जी ने हिसाब करते हुए ₹15 हजारे की माला और ₹40 गुलाब की माला लगाकर रुपए पकड़ाए।


वह कुछ देर इधर-उधर देखती रही । फिर गहराते अंधेरे का आभास  कर और किसी अन्य ग्राहक को न आते देख भरे मन से मालाएं कागज में पैक करने लगी।


"हम थोड़ी देर में घूम कर आते हैं ‌फिर यह मालाऐं तुझ से ले लेंगे । कहते हुए द्वारका जी शर्मा जी का हाथ पकड़ आगे बढ़ लिए।

"इतनी मालाओं का क्या करोगे द्वारका जी?"


"शर्मा जी ! कल तीन जगह पूजा होनी है और इससे सस्ती मालाएं मुझे कहीं नहीं मिलने वाली।"


लौटते वक्त बातों में दोनों मित्र ऐसा लगे की मालाएं लेना भूल गए। खाना खाने के बाद पत्नी ने द्वारका जी को उलाहना दिया।

"मैंने तो पूजा की सारी तैयारी कर ली किंतु कहने के बावजूद आप माला लेकर नहीं आए।"

*क्या मालाएं?? अरे बाप रे!!"


और उन्होंने पत्नी को सारा किस्सा बताया। फिर गाड़ी लेकर तुरंत रवाना होने लगे ।


"रहने दो ! अब तुम्हें वहां कौन मिलेगा? कल सुबह जल्दी ही मंदिर से मालाएं खरीद लेंगे।" पत्नी ने उन्हें रोका।


"उम्मीद तो मुझे भी बिल्कुल नहीं है किंतु एक बार प्रयास तो करके देख लेता हूं‌।" कहते हुए द्वारका जी रवाना हुए।


रात के 9:00 बज चुके थे। बाजार में कुछ दुकानें अभी भी खुली थी किंतु फूल माला लेकर बैठने वाले जा चुके थे।


द्वारका जी ने गाड़ी रोकी और उस अंधेरे कोने की ओर बढ़े जहां से उन्होंने मालाएं खरीदी थी।

वह अभी भी टोकरी लेकर वहीं बैठी थी।

"बाबूजी आप इतनी देरी से आए हैं! आपको पता भी है मेरा घर कितनी दूर है। मेरी मां घर पर भूखी होगी। और पता है यहां पर पुलिसवालों और बदमाशों ने मुझे कितना परेशान किया।" द्वारका जी को देखते ही वह फूट पड़ी।


"मुझ पर चिल्ला रही हो। इतना ही था तो चली जाती।"


"ऐसे कैसे चली जाती? आखिर आपकी अमानत मेरे पास थी।"

द्वारका जी स्तब्ध रह गए। कुछ क्षण बाद शब्द बटोर कर बोले।

"तो क्या हुआ? अगर मालाऐं ले भी जाती तो मेरे क्या फर्क पड़ता ?"

"आपके फर्क नहीं पड़ता, बाबूजी! हमारे फर्क पड़ता है। अगर मैं आपको यहां पर नहीं मिलती तो क्या आप कभी सड़क पर बैठकर धंधा करने वाले हम जैसे छोटे लोगों का विश्वास करते? आप हमें चोर समझते और फिर कभी हमसे नहीं खरीदते। मां ने सिखाया है ग्राहक का विश्वास ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है।"

"और अगर मैं रात भर नहीं आता तो?"

"मैं घंटे भर और इंतजार करती फिर आपके नाम से मंदिर में मालाएं चढ़ा देती।"

द्वारका जी के शब्द  अब कहीं खो गए थे। वे कुछ देर उसकी ओर अपलक देखते रहे।

फिर उन्होंने एक माला  निकालकर उसके गले में डाली, हाथ में पांच सौ का नोट पकड़ाया फिर शेष मालाएं गाड़ी की पिछली सीट पर रखीं, टोकरी डिक्की में रखी और उसका हाथ पकड़ सामने स्थित रेस्तरां में ले गए और खाना पेक करवाने का आदेश दिया।

उसने विरोध किया किंतु द्वारका जी के आगे उसकी एक न चली।

"चल मैं तुझे घर तक छोड़ कर आता हूं।" खाना पैक होते होते उन्होंने कहा।

"बाबूजी !आप यह क्या कर रहे हैं? मैं अपने आप चली जाऊंगी।" उसने फिर विरोध किया।

"बेटा साक्षात लक्ष्मी को भोग लगा रहा हूं। मना मत कर। मेरी लक्ष्मी पूजा तो आज ही हो गई है।"

समाप्त

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Thursday, June 10, 2021

दशावतार

एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत पाकर अपने विदेश में रहने वाले बेटे से विडियो चैट करते वक्त पूछ बैठी-

"बेटा! कुछ पूजा-पाठ भी करते हो या नहीं?"

बेटा बोला-

"माँ, मैं एक जीव वैज्ञानिक हूँ। मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम कर रहा हूँ। विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन.. क्या आपने उसके बारे में सुना भी है?"

उसकी माँ मुस्कुराई
और बोली.....
"मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ बेटा.. उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के लिए बहुत पुरानी खबर है।"

“हो सकता है माँ!” बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा।

“यदि तुम कुछ समझदार हो, तो इसे सुनो..” उसकी माँ ने प्रतिकार किया।
“क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है?
विष्णु के दस अवतार ?”
बेटे ने सहमति में कहा...
"हाँ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना?"

माँ फिर बोली-
"लेना-देना है..
मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन क्या नहीं जानते हो ?"

“पहला अवतार था 'मत्स्य', यानि मछली। ऐसा इसलिए कि
जीवन पानी में आरम्भ हुआ। यह बात सही है या नहीं?”

बेटा अब ध्यानपूर्वक सुनने लगा..

“उसके बाद आया दूसरा अवतार 'कूर्म', अर्थात् कछुआ
क्योंकि 
जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया.. 'उभयचर (Amphibian)',
तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर के विकास को दर्शाया।”

“तीसरा था 'वराह' अवतार, यानी सूअर। जिसका मतलब वे जंगली जानवर, जिनमें अधिक बुद्धि नहीं होती है। तुम उन्हें डायनासोर कहते हो।”
बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई..

“चौथा अवतार था 'नृसिंह', आधा मानव, आधा पशु। जिसने दर्शाया जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों का विकास।”

“पांचवें 'वामन' हुए, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था।
क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है? क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे- होमो इरेक्टस(नरवानर) और होमो सेपिअंस (मानव), और
होमो सेपिअंस ने विकास की लड़ाई जीत ली।”

बेटा दशावतार की प्रासंगिकता सुन के स्तब्ध रह गया..

माँ ने बोलना जारी रखा-
“छठा अवतार था 'परशुराम', जिनके पास शस्त्र (कुल्हाड़ी) की ताकत थी। वे दर्शाते हैं उस मानव को, जो गुफा और वन में रहा.. गुस्सैल और असामाजिक।”

“सातवां अवतार थे 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम', सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति। जिन्होंने समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार।”

“आठवां अवतार थे 'भगवान श्री कृष्ण', राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी। जिन्होंने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक ढांचे में रहकर कैसे फला-फूला जा सकता है?”
बेटा सुनता रहा, चकित और विस्मित..

माँ ने ज्ञान की गंगा प्रवाहित रखी -
“नवां * थे 'महात्मा बुद्ध', वे व्यक्ति जिन्होंने नृसिंह से उठे मानव के सही स्वभाव को खोजा। उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की।”

“..और अंत में दसवां अवतार 'कल्कि' आएगा। वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो.. वह मानव, जो आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठतम होगा।”

बेटा अपनी माँ को अवाक् होकर देखता रह गया..

अंत में वह बोल पड़ा-
“यह अद्भुत है माँ.. हिंदू दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है!”

मित्रों..
वेद, पुराण, ग्रंथ, उपनिषद इत्यादि सब अर्थपूर्ण हैं। सिर्फ आपका देखने का नज़रिया होना चाहिए। फिर चाहे वह धार्मिक हो या वैज्ञानिकता.

सफलता सूत्र

सफलता सूत्र
- सीए सुधीर कुमार वार्ष्णेय 
राज एक मजदूर का बेटा था और कस्बे के सरकारी स्कूल में पढ़ता था। सरकारी स्कूल और राज के घर के बीच में एक पब्लिक स्कूल था जिसमे शहर के धनाढ्य लोगों के बच्चे पढ़ने आते थे। राज अपने स्कूल जाते अक्सर उन बच्चों को स्कूल आते देखता था। चमचमाती ड्रेस पहने अपनी गाड़ियों से आते बच्चों को देख कर उसे अपने आप पर और अपने भाग्य पर गुस्सा आता था और उन अमीर बच्चों के भाग्य से ईर्ष्या। राज वैसे तो पढ़ाई में अच्छा था लेकिन उसे लगता था कि सरकारी स्कूल में पढ़ कर आप उतने सफल नहीं हो सकते जितने प्राइवेट स्कूल में पढ़ कर। इसी विचार की वजह से उसका मन पढ़ाई से उचटता जा रहा था। हालात ये हो गए की उसने अपने पिता से उसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की बात कही बरना पढ़ाई न करने की धमकी दी। 
उसके मजदूर पिता ने ऐसा करने में असमर्थता जताई क्योंकि उसके आय के स्रोत बहुत सीमित थे जिसमे वो उसे सरकारी स्कूल में जैसे तैसे पढ़ा सकता था। पिता ने उस से इस जिद की वजह पूछी तो उसने बताने से इंकार कर दिया और अपनी बात पर अड़ा रहा। अपनी बात न मानते देख राज विद्रोह पर उतर आया और उसने स्कूल जाना बंद कर दिया। उसके पिता राज के व्यवहार से और उसकी जिद से परेशान थे। उसके पिता चाहते थे की जब वो बड़ा हो तो पढ़ लिख कर कोई सही सी नौकरी करे और उसकी तरह जिंदगी भर मजदूरी न करे। दो चार दिन उसके पिता ने उसे मनाने की कोशिश की लेकिन राज अपनी जिद पर अड़ा रहा। हारकर उसके पिता ने उसके कक्षाध्यापक से बात कर राज की जिद के बारे बताया और कोई हल निकालने को कहा। कक्षाध्यापक ने उसके घर आकर राज से बात करने का अश्वासन दिया। 
एक दिन कक्षाध्यापक राज के घर पर पहुंचे और उस से स्कूल न आने का कारण जानना चाहा। राज ने बताया कि वो सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ना चाहता। कक्षाध्यापक ने इसका कारण जानना चाहा तो राज ने कहा कि वो पढ़ने में ठीक है और उसे लगता है कि प्राइवेट स्कूल में पढ़ कर उसका भविष्य ज्यादा उज्जवल होगा। कक्षाध्यापक ने उसे समझाया – ‘ऐसा मानना सही नहीं है कि पढ़ने की जगह आपका भविष्य तय करती है। आपका भविष्य आपके दिमाग और उसके ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता एवं ग्रहण किये गए ज्ञान को सही तरह से उपयोग करने पर निर्भर करता है। यह ठीक है कि समाज में प्राइवेट स्कूलों में पढने वाले बच्चों को ज्यादा स्मार्ट माना जाता है लेकिन यह मानना तो सरासर गलत है कि सरकारी स्कूलों के बच्चों में प्रतिभा नहीं होती या वो स्मार्ट नहीं होते। दिमाग के दरवाजे अगर खुले रखो तो ज्ञान कहीं से भी अर्जित किया जा सकता है। क्या एकलव्य ने द्रोणाचार्य के द्वारा धनुर्विद्या देने से मना करने पर अभ्यास करना छोड़ दिया था? ये जो ज्ञान ग्रहण करने की, सीखने की प्यास जगह देख कर नहीं वरन आपके इरादों से पूरी होती है। अगर आप सही स्रोत से, सही तरीके से ज्ञानार्जन करेंगे और उपार्जित ज्ञान को सही तरीके से उपयोग करना सीखा जायेंगे तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम गरीब हो या अमीर अथवा तुम सरकारी स्कूल में पढ़ते हो या प्राइवेट स्कूल में। तुम्हारे पिता एक मजदूर है लेकिन वो नहीं चाहते की तुम भी उनके तरह मजदूर बनो। वो तुम्हे आगे बढ़ता हुआ देखना चाहते है और तुम अपनी जिद में अपना भविष्य बर्बाद करने पर तुले हो जो कतई सही नहीं है। आशा है तुम्हे मेरी बातें समझ आ गयी होंगी। अगर हाँ तो कल से नियमित स्कूल आना शुरू करो और अपना पूरा दिमाग पढ़ाई में लगाओ जिस से तुम्हारा भविष्य उज्जवल हो सके।' राज ने सहमति में अपना सर हिलाया तो कक्षाध्यापक ने उसके सर पर हाथ रखा और विदा ली।
फेज - 2, श्री अक्रूर जी पुरम, रामबाग रोड, चंदौसी - 244412 जिला संभल (उत्तर प्रदेश)

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