Thursday, June 10, 2021

दशावतार

एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत पाकर अपने विदेश में रहने वाले बेटे से विडियो चैट करते वक्त पूछ बैठी-

"बेटा! कुछ पूजा-पाठ भी करते हो या नहीं?"

बेटा बोला-

"माँ, मैं एक जीव वैज्ञानिक हूँ। मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम कर रहा हूँ। विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन.. क्या आपने उसके बारे में सुना भी है?"

उसकी माँ मुस्कुराई
और बोली.....
"मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ बेटा.. उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के लिए बहुत पुरानी खबर है।"

“हो सकता है माँ!” बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा।

“यदि तुम कुछ समझदार हो, तो इसे सुनो..” उसकी माँ ने प्रतिकार किया।
“क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है?
विष्णु के दस अवतार ?”
बेटे ने सहमति में कहा...
"हाँ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना?"

माँ फिर बोली-
"लेना-देना है..
मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन क्या नहीं जानते हो ?"

“पहला अवतार था 'मत्स्य', यानि मछली। ऐसा इसलिए कि
जीवन पानी में आरम्भ हुआ। यह बात सही है या नहीं?”

बेटा अब ध्यानपूर्वक सुनने लगा..

“उसके बाद आया दूसरा अवतार 'कूर्म', अर्थात् कछुआ
क्योंकि 
जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया.. 'उभयचर (Amphibian)',
तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर के विकास को दर्शाया।”

“तीसरा था 'वराह' अवतार, यानी सूअर। जिसका मतलब वे जंगली जानवर, जिनमें अधिक बुद्धि नहीं होती है। तुम उन्हें डायनासोर कहते हो।”
बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई..

“चौथा अवतार था 'नृसिंह', आधा मानव, आधा पशु। जिसने दर्शाया जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों का विकास।”

“पांचवें 'वामन' हुए, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था।
क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है? क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे- होमो इरेक्टस(नरवानर) और होमो सेपिअंस (मानव), और
होमो सेपिअंस ने विकास की लड़ाई जीत ली।”

बेटा दशावतार की प्रासंगिकता सुन के स्तब्ध रह गया..

माँ ने बोलना जारी रखा-
“छठा अवतार था 'परशुराम', जिनके पास शस्त्र (कुल्हाड़ी) की ताकत थी। वे दर्शाते हैं उस मानव को, जो गुफा और वन में रहा.. गुस्सैल और असामाजिक।”

“सातवां अवतार थे 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम', सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति। जिन्होंने समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार।”

“आठवां अवतार थे 'भगवान श्री कृष्ण', राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी। जिन्होंने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक ढांचे में रहकर कैसे फला-फूला जा सकता है?”
बेटा सुनता रहा, चकित और विस्मित..

माँ ने ज्ञान की गंगा प्रवाहित रखी -
“नवां * थे 'महात्मा बुद्ध', वे व्यक्ति जिन्होंने नृसिंह से उठे मानव के सही स्वभाव को खोजा। उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की।”

“..और अंत में दसवां अवतार 'कल्कि' आएगा। वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो.. वह मानव, जो आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठतम होगा।”

बेटा अपनी माँ को अवाक् होकर देखता रह गया..

अंत में वह बोल पड़ा-
“यह अद्भुत है माँ.. हिंदू दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है!”

मित्रों..
वेद, पुराण, ग्रंथ, उपनिषद इत्यादि सब अर्थपूर्ण हैं। सिर्फ आपका देखने का नज़रिया होना चाहिए। फिर चाहे वह धार्मिक हो या वैज्ञानिकता.

सफलता सूत्र

सफलता सूत्र
- सीए सुधीर कुमार वार्ष्णेय 
राज एक मजदूर का बेटा था और कस्बे के सरकारी स्कूल में पढ़ता था। सरकारी स्कूल और राज के घर के बीच में एक पब्लिक स्कूल था जिसमे शहर के धनाढ्य लोगों के बच्चे पढ़ने आते थे। राज अपने स्कूल जाते अक्सर उन बच्चों को स्कूल आते देखता था। चमचमाती ड्रेस पहने अपनी गाड़ियों से आते बच्चों को देख कर उसे अपने आप पर और अपने भाग्य पर गुस्सा आता था और उन अमीर बच्चों के भाग्य से ईर्ष्या। राज वैसे तो पढ़ाई में अच्छा था लेकिन उसे लगता था कि सरकारी स्कूल में पढ़ कर आप उतने सफल नहीं हो सकते जितने प्राइवेट स्कूल में पढ़ कर। इसी विचार की वजह से उसका मन पढ़ाई से उचटता जा रहा था। हालात ये हो गए की उसने अपने पिता से उसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की बात कही बरना पढ़ाई न करने की धमकी दी। 
उसके मजदूर पिता ने ऐसा करने में असमर्थता जताई क्योंकि उसके आय के स्रोत बहुत सीमित थे जिसमे वो उसे सरकारी स्कूल में जैसे तैसे पढ़ा सकता था। पिता ने उस से इस जिद की वजह पूछी तो उसने बताने से इंकार कर दिया और अपनी बात पर अड़ा रहा। अपनी बात न मानते देख राज विद्रोह पर उतर आया और उसने स्कूल जाना बंद कर दिया। उसके पिता राज के व्यवहार से और उसकी जिद से परेशान थे। उसके पिता चाहते थे की जब वो बड़ा हो तो पढ़ लिख कर कोई सही सी नौकरी करे और उसकी तरह जिंदगी भर मजदूरी न करे। दो चार दिन उसके पिता ने उसे मनाने की कोशिश की लेकिन राज अपनी जिद पर अड़ा रहा। हारकर उसके पिता ने उसके कक्षाध्यापक से बात कर राज की जिद के बारे बताया और कोई हल निकालने को कहा। कक्षाध्यापक ने उसके घर आकर राज से बात करने का अश्वासन दिया। 
एक दिन कक्षाध्यापक राज के घर पर पहुंचे और उस से स्कूल न आने का कारण जानना चाहा। राज ने बताया कि वो सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ना चाहता। कक्षाध्यापक ने इसका कारण जानना चाहा तो राज ने कहा कि वो पढ़ने में ठीक है और उसे लगता है कि प्राइवेट स्कूल में पढ़ कर उसका भविष्य ज्यादा उज्जवल होगा। कक्षाध्यापक ने उसे समझाया – ‘ऐसा मानना सही नहीं है कि पढ़ने की जगह आपका भविष्य तय करती है। आपका भविष्य आपके दिमाग और उसके ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता एवं ग्रहण किये गए ज्ञान को सही तरह से उपयोग करने पर निर्भर करता है। यह ठीक है कि समाज में प्राइवेट स्कूलों में पढने वाले बच्चों को ज्यादा स्मार्ट माना जाता है लेकिन यह मानना तो सरासर गलत है कि सरकारी स्कूलों के बच्चों में प्रतिभा नहीं होती या वो स्मार्ट नहीं होते। दिमाग के दरवाजे अगर खुले रखो तो ज्ञान कहीं से भी अर्जित किया जा सकता है। क्या एकलव्य ने द्रोणाचार्य के द्वारा धनुर्विद्या देने से मना करने पर अभ्यास करना छोड़ दिया था? ये जो ज्ञान ग्रहण करने की, सीखने की प्यास जगह देख कर नहीं वरन आपके इरादों से पूरी होती है। अगर आप सही स्रोत से, सही तरीके से ज्ञानार्जन करेंगे और उपार्जित ज्ञान को सही तरीके से उपयोग करना सीखा जायेंगे तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम गरीब हो या अमीर अथवा तुम सरकारी स्कूल में पढ़ते हो या प्राइवेट स्कूल में। तुम्हारे पिता एक मजदूर है लेकिन वो नहीं चाहते की तुम भी उनके तरह मजदूर बनो। वो तुम्हे आगे बढ़ता हुआ देखना चाहते है और तुम अपनी जिद में अपना भविष्य बर्बाद करने पर तुले हो जो कतई सही नहीं है। आशा है तुम्हे मेरी बातें समझ आ गयी होंगी। अगर हाँ तो कल से नियमित स्कूल आना शुरू करो और अपना पूरा दिमाग पढ़ाई में लगाओ जिस से तुम्हारा भविष्य उज्जवल हो सके।' राज ने सहमति में अपना सर हिलाया तो कक्षाध्यापक ने उसके सर पर हाथ रखा और विदा ली।
फेज - 2, श्री अक्रूर जी पुरम, रामबाग रोड, चंदौसी - 244412 जिला संभल (उत्तर प्रदेश)

Tuesday, May 18, 2021

*💐💐अनपढ़ डॉक्टर💐💐*

*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
          
*💐💐अनपढ़ डॉक्टर💐💐*
केपटाउन के अशिक्षित व्यक्ति सर्जन श्री हैमिल्टन नकी, जो एक भी अंग्रेज़ी शब्द नहीं पढ़ सकते थे और ना ही लिख सकते थे, जिन्होंने अपने जीवन में कभी स्कूल का चेहरा नहीं देखा था... उन्हें मास्टर ऑफ मेडिसीन की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया ।
आइए देखे कि यह कैसे संभव है ...
केपटाउन मेडिकल यूनिवर्सिटी जगत् में अग्रणी स्थान पर है । दुनिया का पहला बाइपास ऑपरेशन इसी विश्वविद्यालय में हुआ । सन् 2003 में, एक सुबह, विश्व प्रसिद्ध सर्जन प्रोफेसर डेविड डेंट ने विश्वविद्यालय के सभागार में घोषणा की: "आज हम उस व्यक्ति को चिकित्सा क्षेत्र में मानद उपाधि प्रदान कर रहे हैं, जिसने सबसे अधिक सर्जरी की हैं ।
इस घोषणा के साथ प्रोफेसर ने "हैमिल्टन" का गौरव किया और पूरा सभागार खड़ा हो गया । हैमिल्टन ने सभी को अभिवादन किया ...
यह इस विश्वविद्यालय के इतिहास का सबसे बड़ा स्वागत समारोह था ।
हैमिल्टन का जन्म केपटाउन के एक सुदूर गाँव सैनिटानी में हुआ था । उनके माता-पिता चरवाहे थे, वे बचपन में बकरी की खाल पहनते और पूरे दिन नंगे पांव पहाड़ों में घूमते रहते उनके पिताजी बीमार पड़ने के कारण हैमिल्टन केपटाउन पहुँचे । वही विश्वविद्यालय का निर्माण कार्य चला था । वे एक मज़दूर के रूप में विश्वविद्यालय से जुड़े । कई वर्षो तक उन्होंने वहाँ काम किया । दिन भर के काम के बाद जितना पैसा मिलता, वह घर भेज देते थे और खुद सिकुड़ कर खुले मैदान में सो जाते थे । उसके बाद उन्हें टेनिस कोर्ट के ग्राउंड्स मेंटेनेंस वर्कर के रुप में रखा गया । यह काम करते हुए तीन साल बीते ।
फिर उनके जीवन में एक अजीब मोड़ आया और वह चिकित्सा विज्ञान में एक ऐसे बिंदु पर पहुँच गए, जहाँ कोई और कभी नहीं पहुँच पाया था ।

यह एक सुनहरी सुबह थी । "प्रोफेसर रॉबर्ट जॉयस, जिराफों पर शोध करना चाहते थे: उन्होंने ऑपरेटिंग टेबल पर एक जिराफ रखा, उसे बेहोश कर दिया, लेकिन जैसे ही ऑपरेशन शुरू हुआ, जिराफ ने अपना सिर हिला दिया। उन्हें जिराफ की गर्दन को मजबूती से पकड़े रखने के लिए एक हट्टे कट्टे आदमी की जरूरत थी । प्रोफेसर थिएटर से बाहर आए, 'हैमिल्टन' लॉन में काम कर रहे थे, प्रोफेसर ने देखा कि वह मज़बूत कद काठी का स्वस्थ युवक है । उन्होंने उसे बुलाया और उसे जिराफ़ को पकड़ने का आदेश दिया ।
ऑपरेशन आठ घंटे तक चला । ऑपरेशन के दौरान, डॉक्टर चाय और कॉफ़ी ब्रेक लेते रहे, हालांकि "हैमिल्टन" वे जिराफ़ की गर्दन पकड़कर खड़े रहे । जब ऑपरेशन खत्म हो गया, तो हैमिल्टन चुपचाप चले गए । 

अगले दिन प्रोफेसर ने हैमिल्टन को फिर से बुलाया, वह आया और जिराफ की गर्दन पकड़कर खड़ा हो गया, इसके बाद यह उसकी दिनचर्या बन गई । हैमिल्टन ने कई महीनों तक दुगना काम किया, और उसने न अधिक पैसे माँगे, ना ही कभी कोई शिकायत की । प्रोफेसर रॉबर्ट जॉयस उनकी दृढ़ता और ईमानदारी से प्रभावित हुए और हैमिल्टन को टेनिस कोर्ट से 'लैब असिस्टेंट' के रूप में पदोन्नत किया गया । अब वह विश्वविद्यालय के ऑपरेटिंग थियेटर में सर्जनों की मदद करने लगे । यह प्रक्रिया सालों तक चलती रही ।

1958 में उनके जीवन में एक और मोड़ आया । इस वर्ष डॉ. बर्नार्ड ने विश्वविद्यालय में आकर हृदय प्रत्यारोपण ऑपरेशन शुरू किया । हैमिल्टन उनके सहायक बन गए, इन ऑपरेशनों के दौरान, वे सहायक से अतिरिक्त सर्जन पद पर कार्यरत थे ।
अब डॉक्टर ऑपरेशन करते और ऑपरेशन के बाद हैमिल्टन को सिलाई का काम दिया जाता था । वह बेहतरीन टाँके लगाते। उनकी उंगलियाँ साफ और तेज थीं । वे एक दिन में पचास लोगों को टाँके लगाते थे । ऑपरेटिंग थियेटर में काम करने के दौरान, वे मानव शरीर को सर्जनों से अधिक समझने लगे इसलिए वरिष्ठ डॉक्टरों ने उन्हें अध्यापन की जिम्मेदारी सौंपी ।
उन्होंने अब जूनियर डॉक्टरों को सर्जरी तकनीक सिखाना शुरू किया । वह धीरे-धीरे विश्वविद्यालय में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए । वह चिकित्सा विज्ञान की शर्तों से अपरिचित थे लेकिन वह सबसे कुशल सर्जन साबित हुए ।

उनके जीवन में तीसरा मोड़ सन् 1970 में आया, जब इस साल लीवर पर शोध शुरू हुआ और उन्होंने सर्जरी के दौरान लीवर की एक ऐसी धमनी की पहचान की, जिससे लीवर प्रत्यारोपण आसान हुआ । उनकी टिप्पणियों ने चिकित्सा विज्ञान के महान दिमागों को चकित कर दिया।
आज, जब दुनिया के किसी कोने में किसी व्यक्ति का लीवर ऑपरेशन होता है और मरीज अपनी आँखें खोलता है, नई उम्मीद से फिर से जी उठता है तब इस सफल ऑपरेशन का श्रेय सीधे "हैमिल्टन" को जाता है ।
हैमिल्टन ने ईमानदारी और दृढ़ता के साथ यह मुकाम हासिल किया । वे केपटाउन विश्वविद्यालय से 50 वर्षों तक जुड़े रहे । उन 50 वर्षों में उन्होंने कभी छुट्टी नहीं ली।

वे रात को तीन बजे घर से निकलते थे, 14 मील पैदल चलकर विश्वविद्यालय जाते थे, और वह ठीक छः बजे ऑपरेशन थिएटर में प्रवेश करते थे । लोग उनके समय के साथ अपनी घड़ियों को ठीक करते थे ।
उन्हें यह सम्मान मिला जो चिकित्सा विज्ञान में किसी को भी नहीं मिला है।

वे चिकित्सा इतिहास के पहले अनपढ़ शिक्षक थे । वे अपने जीवनकाल में 30,000 सर्जनों को प्रशिक्षित करनेवाले पहले निरक्षर सर्जन थे ।
2005 में उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें विश्वविद्यालय में दफनाया गया । इसके बाद सर्जनों को विश्वविद्यालय ने अनिवार्य कर दिया गया कि वे डिग्री हासिल करने के बाद उनकी कब्र पर जाएँ, एक तस्वीर खिंचे और फिर अपने सेवा कार्य में जुटे ।
"आपको पता है कि उन्हें यह पद कैसे मिला ?”
"केवल एक 'हाँ'।"

जिस दिन उन्हें जिराफ की गर्दन पकड़ने के लिए ऑपरेटिंग थियेटर में बुलाया गया, अगर उन्होंने उस दिन मना कर दिया होता, अगर उस दिन उन्होंने कहा होता,' मैं ग्राउंड्स मेंटेनेंस वर्कर हूँ, मेरा काम जिराफ की गर्दन पकड़ना नहीं है तब…' सोचिए! केवल एक ''हाँ ।" और अतिरिक्त आठ घंटे की कड़ी मेहनत थी, जिसने उनके लिए सफलता के द्वार खोल दिए और वह सर्जन बन गए ।
 
"हम में से ज्यादातर लोग अपने जीवनभर नौकरी की तलाश में रहते हैं जबकि हमें काम ढूंढना होता है । ” दुनिया में हर काम का एक मानदंड होता है और नौकरी केवल उन लोगों के लिए उपलब्ध होती है जो मानदंडों को पूरा करते हैं जबकि अगर आप काम करना चाहते हैं, तो आप दुनिया में कोई भी काम कुछ ही मिनटों में शुरू कर सकते हैं और कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकेगी । 
 
हैमिल्टन ने रहस्य पाया था, उन्होंने नौकरी के बजाय काम करते रहने को महत्व दिया । इस प्रकार उन्होंने चिकित्सा-विज्ञान के इतिहास को बदल दिया । सोचिए अगर वे सर्जन की नौकरी के लिए आवेदन करते तो क्या वह सर्जन बन सकते थे ? कभी नहीं, लेकिन उन्होंने जिराफ की गर्दन पकड़ी और सर्जन बन गए ।

*सीख-बेरोज़गार लोग असफल होते हैं क्योंकि वे सिर्फ नौकरी की तलाश करते हैं, काम की नहीं । जिस दिन आपने "हैमिल्टन" की तरह काम करना शुरू किया, आप सफल एवं महान मानव बन जाएँगे ।

*सदैव प्रसन्न रहिये।
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

Featured Post

हमारे साथ श्री रघुनाथ, फिर किस बात की चिंता।

  बीते दिनों बेटे का टूर्नामेंट था। आयोजन नोएडा के एक प्रतिष्ठित स्कूल में था।  हम दोनों बाप बेटा एक लंबी ड्राइव के बाद आयोजन स्थल पर पहुंचे...